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इंदिरा एकादशी 2025 तिथि, महत्व, कथा और व्रत विधि की पूरी जानकारी

इंदिरा एकादशी 2025  तिथि, महत्व, कथा और व्रत विधि की संपूर्ण जानकारी

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। वर्षभर में 24 एकादशियाँ आती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अलग नाम और महत्व होता है। इन्हीं में से एक है इंदिरा एकादशी, जो अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आती है। यह व्रत विशेष रूप से पितरों की शांति और मोक्ष के लिए किया जाता है।

साल 2025 में इंदिरा एकादशी 17 सितम्बर, बुधवार को मनाई जाएगी। यह तिथि पितृपक्ष के दौरान आती है और इसे पितरों की आत्मा की शांति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।


1. इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त

 इस दिन व्रत रखने वाले भक्त प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और संध्या तक उपवास रखते हैं।

2. इंदिरा एकादशी का महत्व

इंदिरा एकादशी को “पितृमोक्ष एकादशी” भी कहा जाता है।


3. इंदिरा एकादशी की कथा (पौराणिक कहानी)

इंदिरा एकादशी की कथा

पौराणिक ग्रंथ ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार सतयुग में राजा इंद्रसेन नामक एक धर्मात्मा राजा शासन करते थे। वे अपने राज्य में धर्म, दया और न्याय के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन जब वे अपने दरबार में बैठे हुए थे, तभी ऋषि नारद जी वहाँ आए।

नारद जी ने राजा से कहा –
“हे राजन! आपके पिता यमलोक में अपने कर्मों के कारण दुख भोग रहे हैं। यदि आप उन्हें मुक्ति दिलाना चाहते हैं तो आने वाले पितृपक्ष में इंदिरा एकादशी व्रत करें और उस व्रत का फल अपने पितरों को अर्पित करें। ऐसा करने से आपके पिता को पापों से छुटकारा मिलेगा और उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।”

राजा इंद्रसेन ने ऋषि की आज्ञा का पालन किया। उन्होंने विधिपूर्वक व्रत किया और उसका फल अपने पिता को अर्पित किया। परिणामस्वरूप उनके पिता को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई और वे पितृशाप से मुक्त हो गए।


इस कथा से मिलने वाली सीख

पद्म पुराण के अनुसार, त्रेतायुग में सत्यकेतु नामक राजा हुआ। उनके पिता का निधन हो गया और वे यमलोक चले गए। सत्यकेतु अपने पिता की आत्मा की मुक्ति के लिए चिंतित रहते थे।

उन्होंने महर्षि नारद से उपाय पूछा। नारद जी ने उन्हें इंदिरा एकादशी व्रत का पालन करने की सलाह दी। सत्यकेतु ने विधिपूर्वक इस व्रत का पालन किया और उसका फल अपने पितरों को अर्पित किया। परिणामस्वरूप उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिली और वे वैकुंठ धाम चले गए।

तभी से इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व और बढ़ गया।


4. इंदिरा एकादशी व्रत विधि

इंदिरा एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। इसकी विधि इस प्रकार है:

  1. प्रातःकाल स्नान और संकल्प – व्रतधारी सूर्योदय से पहले स्नान कर पवित्र वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।

  2. पूजन स्थान की तैयारी – घर के मंदिर या पूजा स्थल को स्वच्छ करें और गंगाजल का छिड़काव करें।

  3. भगवान विष्णु की पूजा – पीले वस्त्र पहनाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

  4. व्रत की सामग्री – तुलसी पत्ते, पंचामृत, फूल, दीपक, धूप, फल और नैवेद्य तैयार करें।

  5. पूजा प्रक्रिया – दीप जलाकर श्री विष्णु के मंत्रों का जप करें और तुलसी दल अर्पित करें।

  6. पितरों का तर्पण – इस दिन पितरों के लिए जल तर्पण करना अनिवार्य माना गया है।

  7. भोजन नियम – व्रतधारी दिनभर फलाहार पर रहते हैं और रात को भजन-कीर्तन करके भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं।

  8. पारण – द्वादशी तिथि के दिन (अगले दिन) सूर्योदय के बाद व्रत का पारण किया जाता है।


5. पितृपक्ष और इंदिरा एकादशी का संबंध


6. व्रत के नियम


7. वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण

धार्मिक महत्व से इतर इंदिरा एकादशी का सामाजिक और वैज्ञानिक पक्ष भी है।


8. इंदिरा एकादशी के लाभ

इंदिरा एकादशी व्रत के आध्यात्मिक लाभ

इंदिरा एकादशी के धार्मिक लाभ

इंदिरा एकादशी के पारिवारिक लाभ

इंदिरा एकादशी के वैज्ञानिक और व्यावहारिक लाभ

  1. पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति।

  2. व्रतधारी को पापों से मुक्ति और पुण्य फल।

  3. पितृदोष से मुक्ति मिलती है।

  4. परिवार में सुख-समृद्धि और शांति का आगमन होता है।

  5. धार्मिक दृष्टि से यह व्रत अमूल्य फलदायी माना गया है।


9. इंदिरा एकादशी से जुड़े विशेष मंत्र

इंदिरा एकादशी 2025 केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर भी है। यह व्रत हमें अपने पितरों को स्मरण करने और उनके आशीर्वाद से जीवन को सुखमय बनाने का मार्ग दिखाता है।

इस दिन व्रत, पूजा, तर्पण और दान करके हम अपने जीवन को पवित्र बनाते हैं और पितरों की आत्मा को मोक्ष का मार्ग प्रदान करते हैं।

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