जूडो में भारत की सफलता इसरूप नारंग का एशियाई मंच पर रजत पदक
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भारत ने खेल जगत में एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि देश के युवा खिलाड़ी कठिन परिश्रम, समर्पण और अनुशासन के बल पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रौशन कर सकते हैं। हाल ही में जकार्ता में आयोजित जूनियर एशियाई जूडो चैम्पियनशिप में भारत की उभरती हुई खिलाड़ी इसरूप नारंग ने -78 किलोग्राम भारवर्ग में रजत पदक जीतकर न केवल अपने राज्य और परिवार को गर्वित किया बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया। यह उपलब्धि भारतीय जूडो के लिए बेहद अहम है क्योंकि इस खेल में भारत की मौजूदगी और योगदान धीरे-धीरे मजबूत हो रहे हैं।
इसरूप नारंग की पृष्ठभूमि
इसरूप नारंग, चंडीगढ़ से ताल्लुक रखने वाली एक प्रतिभाशाली जूडो खिलाड़ी हैं। उन्होंने बहुत कम उम्र से ही जूडो की बारीकियों को समझना और अभ्यास करना शुरू कर दिया था। खेल के प्रति उनका जुनून और परिवार का सहयोग उन्हें लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा। इसरूप ने राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने कौशल का लोहा मनवा रही हैं।
जूनियर एशियाई जूडो चैम्पियनशिप 2025
यह प्रतियोगिता जकार्ता (इंडोनेशिया) में आयोजित हुई थी। इसमें एशिया भर से सैकड़ों प्रतिभाशाली जूडो खिलाड़ियों ने भाग लिया। -78 किग्रा भारवर्ग में इसरूप नारंग ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल तक का सफर तय किया। हालांकि फाइनल में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन रजत पदक जीतना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।
उनकी इस सफलता ने यह साबित किया कि भारतीय खिलाड़ी भी जूडो जैसे कठिन और तकनीकी खेल में अपनी पहचान बना सकते हैं।
जूडो खेल की विशेषताएँ
1. शारीरिक और मानसिक संतुलन
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जूडो में केवल शारीरिक ताकत ही नहीं, बल्कि मानसिक एकाग्रता, धैर्य और संतुलन भी महत्वपूर्ण होते हैं।
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खिलाड़ी को प्रतिद्वंद्वी की गति और तकनीक को समझकर तुरंत प्रतिक्रिया देनी होती है।
2. बिना हथियार का आत्मरक्षा कला
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जूडो में किसी हथियार का प्रयोग नहीं होता।
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यह आत्मरक्षा की एक सुरक्षित और प्रभावी विधि है, जिसे रोज़मर्रा की जिंदगी में भी उपयोग किया जा सकता है।
3. फेंकने और पकड़ने की तकनीक
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जूडो की सबसे खास बात है प्रतिद्वंद्वी को ज़मीन पर फेंकने की कला (Throwing Techniques)।
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इसमें पकड़ (Grip), संतुलन बिगाड़ना (Kuzushi) और फेंकना (Nage-Waza) जैसे कौशल शामिल होते हैं।
4. ज़मीन पर नियंत्रण की कला (Groundwork)
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प्रतिद्वंद्वी को केवल गिराना ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर नियंत्रित करना भी ज़रूरी है।
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इसमें पकड़ (Hold), दबाव (Pin), और सबमिशन (Submission) तकनीकें प्रयोग की जाती हैं।
5. ओलंपिक खेल
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जूडो को 1964 टोक्यो ओलंपिक से शामिल किया गया था।
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यह एशिया से निकला पहला मार्शल आर्ट है जिसने ओलंपिक में जगह बनाई।
6. अनुशासन और खेल भावना
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जूडो केवल एक खेल नहीं बल्कि जीवन शैली है, जो सम्मान, आत्म-नियंत्रण, अनुशासन और सहयोग जैसे मूल्यों को सिखाता है।
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खिलाड़ी मुकाबले से पहले और बाद में झुककर (Bow) एक-दूसरे का सम्मान करते हैं।
7. सभी आयु वर्ग के लिए उपयुक्त
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जूडो को छोटे बच्चों से लेकर बड़ों तक हर कोई खेल सकता है।
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यह फिटनेस, आत्मरक्षा और मानसिक विकास के लिए बेहद उपयोगी है।
8. स्वास्थ्य लाभ
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जूडो खेलने से शारीरिक फिटनेस, लचीलापन, मांसपेशियों की मजबूती और स्टैमिना बढ़ता है।
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यह आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत करता है।
जूडो जापान में उत्पन्न हुआ एक मार्शल आर्ट है, जिसका अर्थ होता है “सौम्य मार्ग”। इसमें तकनीक, संतुलन और प्रतिद्वंद्वी की ताकत को उसके खिलाफ इस्तेमाल करने की कला पर जोर दिया जाता है।
- जूडो में शरीर की फुर्ती और मानसिक एकाग्रता दोनों की जरूरत होती है।
- यह ओलंपिक खेलों में भी शामिल है और विश्व स्तर पर बेहद लोकप्रिय है।
- भारत में अभी भी यह खेल क्रिकेट या बैडमिंटन जैसी लोकप्रियता नहीं रखता, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है।
इसरूप नारंग की सफलता का महत्व
इसरूप नारंग की यह उपलब्धि कई मायनों में खास है
- महिला खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा – उनकी जीत से यह संदेश जाता है कि भारतीय महिलाएँ हर खेल में अपनी पहचान बना सकती हैं।
- भारतीय जूडो को पहचान – जूडो में भारत की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ बहुत सीमित रही हैं। इसरूप का रजत पदक इस खेल को और प्रोत्साहन देगा।
- भविष्य की संभावनाएँ – इसरूप अभी जूनियर स्तर पर खेल रही हैं। यदि उन्हें सही प्रशिक्षण और संसाधन मिलते हैं, तो वे भविष्य में एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक में भी पदक ला सकती हैं।
भारत में जूडो की स्थिति
भारत में जूडो की शुरुआत 20वीं सदी के मध्य में हुई। धीरे-धीरे यह खेल विभिन्न राज्यों में फैलने लगा और स्कूल-कॉलेज स्तर पर प्रतियोगिताएँ होने लगीं। लेकिन अब भी:
- पर्याप्त प्रशिक्षण केंद्रों की कमी है।
- उच्च स्तरीय कोचों की संख्या सीमित है।
- खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का exposure (अनुभव) कम मिलता है।
इसके बावजूद हाल के वर्षों में भारतीय जूडो खिलाड़ियों ने एशियन और कॉमनवेल्थ स्तर पर अच्छे प्रदर्शन किए हैं।
सरकार और संघ का सहयोग
भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और जूडो फेडरेशन ऑफ इंडिया (JFI) समय-समय पर जूडो खिलाड़ियों के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते हैं। इसके अलावा, खेलो इंडिया और टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) जैसी योजनाएँ भी खिलाड़ियों को सहयोग और प्रोत्साहन देती हैं। इसरूप नारंग जैसी खिलाड़ी इन योजनाओं का लाभ उठाकर आगे बढ़ रही हैं।
परिवार और कोच का योगदान
हर खिलाड़ी की सफलता के पीछे परिवार और कोच की अहम भूमिका होती है। इसरूप नारंग ने भी कई बार कहा है कि उनके माता-पिता ने हर परिस्थिति में उन्हें सपोर्ट किया और उनके कोच ने उन्हें जूडो की बारीकियाँ सिखाई। यह सहयोग ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले गया।
मीडिया और समाज की भूमिका
भारत में क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों को अक्सर वह पहचान नहीं मिलती जिसके वे हकदार होते हैं। इसरूप नारंग की सफलता जैसी घटनाएँ मीडिया और समाज के लिए एक अवसर हैं कि वे ऐसे खिलाड़ियों को सामने लाएँ। इससे न केवल खिलाड़ी का मनोबल बढ़ता है बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा मिलती है।
भविष्य की राह
इसरूप नारंग अभी बहुत युवा हैं और उनके सामने लंबा करियर है। आने वाले समय में:
- उन्हें ओलंपिक क्वालिफिकेशन में हिस्सा लेने का मौका मिल सकता है।
- एशियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप में उनके पदक जीतने की प्रबल संभावना है।
- उनकी सफलता से भारत में जूडो को लेकर नई लहर पैदा होगी।
इसरूप नारंग की रजत पदक जीत भारत के लिए गर्व की बात है। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि पूरे भारतीय जूडो समुदाय के लिए ऐतिहासिक क्षण है। उनकी सफलता से यह साबित होता है कि यदि खिलाड़ियों को सही मंच और अवसर दिए जाएँ, तो वे किसी भी खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकते हैं।
भारत में खेलों का परिदृश्य बदल रहा है। अब लोग क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में भी रुचि ले रहे हैं। ऐसे में इसरूप नारंग जैसी खिलाड़ी नई पीढ़ी को जूडो की ओर आकर्षित करेंगी और यह खेल देश में नई ऊँचाइयों को छुएगा।
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