नवरात्रि के पहले दिन की महत्वता और धार्मिक मान्यता

नवरात्रि, हिन्दू धर्म का प्रमुख त्योहार है, जो देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार शारदीय नवरात्रि और वासंतिक नवरात्रि के रूप में मुख्यतः दो बार मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि, जिसे मुख्य रूप से पूरे भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, आश्विन मास में होती है। नवरात्रि के पहले दिन को प्रतिपदा कहा जाता है, और इसे विशेष महत्व प्राप्त है।
प्रतिपदा का धार्मिक महत्व
नवरात्रि का पहला दिन, यानी प्रतिपदा, देवी दुर्गा के विशेष रूप शैलपुत्री की पूजा के लिए समर्पित होता है। शैलपुत्री का अर्थ है “पर्वत की पुत्री”। इसे माँ पार्वती का प्रथम रूप माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, शैलपुत्री माता शक्ति और धैर्य का प्रतीक हैं।
प्रतिपदा के दिन देवी की पूजा करने से जीवन में न केवल मानसिक शांति और सामर्थ्य आता है, बल्कि यह नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा का माध्यम भी मानी जाती है। इस दिन से ही नौ दिन की नवरात्रि आराधना शुरू होती है और प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग रूप की पूजा होती है।
प्रतिपदा की पूजा-विधि

1. प्रातःकाल की तैयारी
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स्नान करके स्वच्छ और सात्विक वस्त्र धारण करें।
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घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें।
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पूजा के लिए चौकी या आसन पर लाल/पीले कपड़े बिछाएँ।
2. कलश स्थापना (घटस्थापना)
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कलश में गंगाजल या शुद्ध जल भरें।
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उसमें सुपारी, सिक्का, अक्षत, और पांच आम्रपल्लव डालें।
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कलश के ऊपर नारियल रखकर उसे लाल चुनरी से सजाएँ।
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कलश को मिट्टी के पात्र में रखी गई जौ/गेहूँ की बालियों (बीज बोकर) पर स्थापित करें।
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कलश स्थापना के बाद उसका पूजन करें और उस पर रोली, अक्षत, पुष्प चढ़ाएँ।
3. अखंड ज्योति प्रज्वलित करना
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प्रतिपदा के दिन अखंड ज्योति जलाना बहुत शुभ माना जाता है।
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घी या तेल का दीपक जलाकर माँ दुर्गा के सामने रखें।
4. देवी शैलपुत्री की पूजा
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माँ शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
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उन्हें जल, अक्षत, पुष्प, सिंदूर, धूप और दीप अर्पित करें।
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सफेद रंग के फूल, चुनरी और भोग (जैसे दूध से बनी मिठाई) अर्पित करें।
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“ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः” मंत्र का जाप करें।
5. व्रत का संकल्प
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प्रतिपदा के दिन भक्त व्रत का संकल्प लेते हैं।
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दिनभर फलाहार और सात्विक भोजन करते हैं तथा भक्ति में मन लगाते हैं।
6. आरती और प्रार्थना
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पूजा के अंत में माँ दुर्गा की आरती करें।
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परिवार सहित “जय अम्बे गौरी” या दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
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अंत में माता से सुख-समृद्धि, शांति और शक्ति का आशीर्वाद माँगें।
नवरात्रि के पहले दिन पूजा का आरंभ घट स्थापना से किया जाता है। घट स्थापना में मिट्टी या तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें कलश स्थापित किया जाता है। कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है और उसे आभूषण एवं सिंदूर से सजाया जाता है।
पूजा सामग्री में शामिल होते हैं
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मिट्टी का कलश
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जल
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नारियल
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अक्षत (चावल)
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लाल रंग के फूल
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दीपक और धूप
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हल्दी और सिंदूर
पूजा के दौरान मंत्रों का उच्चारण विशेष महत्व रखता है। प्रतिपदा के दिन “ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः” मंत्र का जाप करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है।
प्रतिपदा व्रत के नियम और लाभ
प्रतिपदा के दिन व्रत करने वाले भक्त शुद्ध हृदय से माँ दुर्गा की आराधना करते हैं। इस दिन व्रत करना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। व्रत के दौरान हल्का भोजन किया जा सकता है और मांसाहारी भोजन से परहेज किया जाता है।
व्रत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है। इसके अलावा, यह शरीर को हल्का रखता है और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
प्रतिपदा के दिन के लिए विशेष पूजा मंत्र

नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा में निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण किया जाता है:
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ॐ देवी शैलपुत्र्यै नम
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ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम
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ॐ देवी चंद्रघण्टायै नम
इन मंत्रों का जाप न केवल धार्मिक पुण्य प्रदान करता है, बल्कि मानसिक स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करता है।
प्रतिपदा के दिन शुभ रंग और सजावट
1. प्रतिपदा का शुभ रंग
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सफेद रंग प्रतिपदा का शुभ रंग माना जाता है।
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सफेद रंग शांति, पवित्रता, सरलता और नई शुरुआत का प्रतीक है।
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इस दिन सफेद वस्त्र पहनना और पूजा स्थान को सफेद रंग की चीज़ों से सजाना शुभ माना जाता है।
2. देवी पूजा में सफेद रंग का महत्व
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माँ शैलपुत्री को सफेद फूल, सफेद चुनरी और सफेद प्रसाद चढ़ाना अत्यंत फलदायी होता है।
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सफेद रंग माँ शक्ति के आशीर्वाद से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है।
3. सजावट के उपाय
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पूजा स्थान
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स्वच्छ सफेद कपड़े से चौकी सजाएँ।
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चौकी पर माँ शैलपुत्री की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
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कलश स्थापना करके उसके ऊपर नारियल, आम्रपल्लव और रोली-मोली से सजाएँ।
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फूल और दीप
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सफेद कमल, चमेली, मोगरा या गुलाब के फूलों का उपयोग करें।
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अखंड ज्योति जलाएँ और दीपक पर हल्दी-रोली का तिलक करें।
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घर की सजावट
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दरवाजे पर आम के पत्तों और गेंदे के फूल की तोरण बाँधें।
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रँगोली में सफेद, पीला और हल्का नीला रंग मिलाकर प्रयोग करें।
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घर में सुगंधित अगरबत्ती या धूप जलाएँ, जिससे वातावरण पवित्र और सकारात्मक बने।
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तिपदा के दिन शुभ रंग और सजावट
हिंदू परंपरा में नवरात्रि के पहले दिन लाल रंग को शुभ माना जाता है। घर और पूजा स्थल पर लाल रंग के फूल और वस्त्रों का उपयोग किया जाता है। यह रंग ऊर्जा, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
घर को सजाने के लिए देवी के चित्र और झाड़-फूस के फूलों से विशेष सजावट की जाती है। साथ ही दीपक और अगरबत्ती जलाकर वातावरण को पवित्र और सकारात्मक बनाया जाता है।
प्रतिपदा का आध्यात्मिक संदेश
नवरात्रि का पहला दिन प्रतिपदा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है। इस दिन का महत्व आत्मशक्ति, नई शुरुआत और आंतरिक शुद्धता से जुड़ा हुआ है।
1. नई ऊर्जा का आरंभ
प्रतिपदा को नवरात्रि का द्वार माना गया है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हर आरंभ शुद्धता और संकल्प के साथ होना चाहिए। यह जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच को जागृत करता है।
2. आत्मशक्ति की पहचान
माँ शैलपुत्री की पूजा प्रतिपदा को की जाती है। वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और धैर्य, साहस और दृढ़ता का प्रतीक हैं। उनका संदेश है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रहकर आत्मशक्ति को पहचानना और उसका सही उपयोग करना चाहिए।
3. शुद्धता और सरलता का महत्व
सफेद रंग, जो प्रतिपदा का शुभ रंग है, हमें शुद्ध मन, पवित्र विचार और सरल जीवन की ओर प्रेरित करता है। यह संदेश देता है कि आध्यात्मिक विकास का आधार पवित्रता और सत्य है।
4. अहंकार से मुक्ति
कलश स्थापना और अखंड ज्योति का आध्यात्मिक अर्थ है कि जीवन में स्थिरता, निरंतरता और विनम्रता जरूरी है। यह हमें अहंकार से मुक्त होकर भीतर की रोशनी जगाने का संकेत देता है।
5. भक्ति और साधना का प्रथम कदम
प्रतिपदा यह संदेश देती है कि आध्यात्मिक साधना का मार्ग धैर्य और श्रद्धा से शुरू होता है। पहले दिन जो संकल्प लिया जाता है, वही पूरे नवरात्रि की साधना की नींव बनता है।
नवरात्रि के पहले दिन का सबसे बड़ा संदेश है – धैर्य, शक्ति और सकारात्मकता। शैलपुत्री माता हमें यह शिक्षा देती हैं कि जीवन में चुनौतियों का सामना दृढ़ता और आत्मविश्वास से करना चाहिए। उनके चरणों में समर्पण और भक्ति से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
प्रतिपदा से ही नवरात्रि का मार्ग शुरू होता है। यह हमें यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक सोच के माध्यम से हम अपने जीवन में नकारात्मकताओं को दूर कर सकते हैं।
आधुनिक संदर्भ में प्रतिपदा
1. नई शुरुआत का संदेश
आधुनिक जीवन में जहाँ तनाव और भागदौड़ अधिक है, प्रतिपदा हमें जीवन में ठहरकर नई शुरुआत करने की प्रेरणा देती है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हर दिन को पवित्रता और नए संकल्प के साथ जिया जा सकता है।
2. सकारात्मकता और मानसिक शांति
आज के व्यस्त जीवन में मानसिक शांति सबसे बड़ी आवश्यकता है। प्रतिपदा पर की जाने वाली पूजा, ध्यान और मंत्रोच्चारण से मन शांत होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
3. प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ाव
कलश स्थापना और जौ/गेहूँ बोने की परंपरा हमें प्रकृति से जुड़ने का अवसर देती है। आधुनिक संदर्भ में यह संदेश देती है कि हमें पर्यावरण का संरक्षण करना चाहिए और हरियाली को बढ़ावा देना चाहिए।
4. महिला शक्ति का सम्मान
प्रतिपदा पर माँ शैलपुत्री की पूजा, स्त्री शक्ति के सम्मान का प्रतीक है। आधुनिक समाज में यह संदेश और भी महत्वपूर्ण है कि हमें महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।
आज के समय में भी प्रतिपदा का महत्व उतना ही बना हुआ है। लोग सोशल मीडिया पर देवी की तस्वीरें साझा करते हैं, वर्चुअल पूजा में भाग लेते हैं और अपने घर को सजाकर त्योहार की शुरुआत करते हैं। यह केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव भी है, जो परिवार और समुदाय को एक साथ जोड़ता है।
नवरात्रि का पहला दिन, प्रतिपदा, न केवल देवी दुर्गा की आराधना का आरंभिक बिंदु है, बल्कि यह जीवन में शक्ति, समर्पण और सकारात्मकता का प्रतीक भी है। शैलपुत्री माता की पूजा से मानसिक शांति, आत्मविश्वास और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है। इस दिन व्रत, मंत्र जाप और घर की सजावट के माध्यम से भक्त अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाते हैं और नवरात्रि के नौ दिवसीय उत्सव की पवित्र शुरुआत करते हैं।
नवरात्रि के पहले दिन का महत्व केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में आध्यात्मिक जागरूकता और सामाजिक मेलजोल का संदेश भी देता है।
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