नेपाल संसद पर हमला एक ऐतिहासिक राजनीतिक संकट

9 सितंबर 2025 को नेपाल की संसद भवन पर हुए हमले ने देश को एक गहरे राजनीतिक संकट में धकेल दिया। इस हमले में कम से कम 51 लोगों की मौत हुई, जिनमें एक भारतीय नागरिक भी शामिल था, और 1,300 से अधिक लोग घायल हुए। इस घटना ने प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया और देश में अस्थिरता की नई लहर को जन्म दिया।
1. राजनीतिक अस्थिरता

नेपाल में पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक अस्थिरता एक गंभीर समस्या रही है।
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लगातार बदलती सरकारें और सत्ता संघर्ष ने सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर दिया।
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राजनीतिक दलों के बीच टकराव और मतभेद ने न केवल प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित किया बल्कि नागरिकों में भी असुरक्षा की भावना पैदा की।
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ऐसी परिस्थितियों में उग्रवादी समूह आसानी से हिंसक घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं।
2. अलगाववादी और उग्रवादी समूह
नेपाल में कुछ अलगाववादी और उग्रवादी समूह लंबे समय से सक्रिय हैं।
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ये समूह अक्सर अपनी राजनीतिक या क्षेत्रीय मांगों को मान्यता दिलाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं।
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संसद पर हमला इसी तरह की उग्र गतिविधियों का परिणाम माना जा रहा है।
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इन समूहों की सक्रियता और संगठनात्मक क्षमता सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बन गई थी।
3. सुरक्षा इंतजामों में चूक
सुरक्षा की कमजोरियों ने हमलावरों को संसद तक पहुँचने का मौका दिया।
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सीमित सुरक्षा बल और निगरानी की कमी ने हमला आसान बना दिया।
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घटना से यह स्पष्ट हुआ कि सुरक्षा रणनीतियों में सुधार और कड़े निगरानी सिस्टम की आवश्यकता है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील सरकारी संस्थानों में आधुनिक सुरक्षा तकनीक का इस्तेमाल न होने से जोखिम बढ़ता है।
हमले की पृष्ठभूमि
इसके अलावा, नेपाल में कुछ अलगाववादी और उग्रवादी समूह सक्रिय हैं, जो अपनी मांगों को पूरा करने के लिए हिंसक गतिविधियों का सहारा लेते रहे हैं। ये समूह अक्सर देश की स्थिरता और संसद जैसे संवेदनशील संस्थानों को निशाना बनाते हैं।
सामाजिक स्तर पर, देश में बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और युवाओं में निराशा बढ़ रही है। इससे समाज में असंतोष फैल रहा है और उग्रवादी गतिविधियों के लिए अनजाने में माहौल तैयार हो रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसी असंतोष का फायदा उठाकर उग्रवादी समूह हिंसक हमले को अंजाम देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय परिदृश्य भी इस पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नेपाल के पड़ोसी देशों के साथ मतभेद और राजनीतिक दबाव कभी-कभी आंतरिक हिंसा को बढ़ावा देते हैं। ऐसे कई मामलों में उग्रवादी समूह बाहरी समर्थन या राजनीतिक प्रेरणा का लाभ उठाकर हिंसक कार्रवाई करते रहे हैं।
सुरक्षा इंतजामों में कमियाँ और निगरानी का अभाव भी हमले की पृष्ठभूमि में शामिल हैं। संसद भवन जैसी संवेदनशील जगहों पर पर्याप्त सुरक्षा न होना और आधुनिक तकनीक का अभाव हमलावरों के लिए अवसर प्रदान करता है।
इस तरह, राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक असंतोष, उग्रवादी गतिविधियाँ, क्षेत्रीय तनाव और सुरक्षा की कमजोरियों का मिश्रण इस भयानक हमले की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
यह हिंसा एक सप्ताह से चल रहे विरोध प्रदर्शनों का परिणाम थी। प्रदर्शनकारियों ने सरकार की भ्रष्टाचार, परिवारवाद और सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ आवाज उठाई थी। 8 सितंबर को पुलिस की गोलीबारी में 19 प्रदर्शनकारी मारे गए, जिसमें एक 12 वर्षीय बच्चा भी शामिल था। इस घटना के बाद, 9 सितंबर को प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के आवासों, और कई मंत्रियों के घरों को आग के हवाले कर दिया। इस हिंसा में तीन पुलिसकर्मी भी मारे गए।
प्रधानमंत्री की इस्तीफा और सत्ता परिवर्तन
नेपाल संसद पर हमले के बाद देश की राजनीतिक स्थिति पहले से भी अधिक तनावपूर्ण हो गई है। इस हमले ने न केवल नागरिकों में डर और असुरक्षा की भावना पैदा की, बल्कि राजनीतिक दलों के बीच भी असंतोष और दबाव बढ़ा दिया।
हमले के तुरंत बाद, विपक्षी दलों और जनता के दबाव के कारण प्रधानमंत्री ने इस्तीफा देने का निर्णय लिया। उनका इस्तीफा देश की राजनीतिक अस्थिरता को और उजागर करता है और यह दर्शाता है कि सरकार की सुरक्षा और प्रशासनिक रणनीतियों में गंभीर कमियाँ थीं।
प्रधानमंत्री के इस्तीफा देने के बाद, नेपाल में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो गई।
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नए नेतृत्व की नियुक्ति के लिए राजनीतिक दलों के बीच वार्ता और गठबंधन की कवायद तेज हो गई।
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यह सत्ता परिवर्तन केवल पदों का बदलाव नहीं था, बल्कि इसमें सरकार की नीतियों, सुरक्षा रणनीतियों और राजनीतिक स्थिरता को सुधारने का लक्ष्य भी शामिल था।
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विशेषज्ञों का कहना है कि इस परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बनाए रखना और भविष्य में ऐसी हिंसक घटनाओं को रोकना है।
सत्ता परिवर्तन के दौरान जनता और राजनीतिक दलों की निगाहें इस बात पर टिकी थीं कि नया नेतृत्व किस तरह से सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करेगा, सामाजिक असंतोष को कम करेगा और देश में स्थिरता लौटाएगा।
इस घटना ने नेपाल की राजनीति में यह स्पष्ट संदेश दिया कि हिंसा और असंतोष की स्थिति में सरकार को जिम्मेदारी निभानी होगी, और यदि सुरक्षा और प्रशासनिक सुधार नहीं किए गए तो राजनीतिक संकट और गहरा सकता है।
हिंसा के बाद, प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने उन्हें अंतरिम सरकार बनाने के लिए कहा, लेकिन ओली का ठिकाना अज्ञात था। इसके बाद, सेना ने राजधानी काठमांडू में कर्फ्यू लागू किया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने चेतावनी दी कि यदि राजनीतिक गतिरोध जारी रहा तो आपातकाल की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
सुषिला कार्की की नियुक्ति
नेपाल संसद पर हुए हमले और प्रधानमंत्री के इस्तीफा देने के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता ने नए नेतृत्व की आवश्यकता को और स्पष्ट कर दिया। इसी संदर्भ में सुषिला कार्की को नेपाल की नई प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया।
सुषिला कार्की की नियुक्ति नेपाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। उन्हें इस जिम्मेदारी के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि उनके पास प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक समझ है, जो देश की वर्तमान संकटपूर्ण स्थिति में स्थिरता लाने में मदद कर सकती है।
उनकी प्राथमिक जिम्मेदारियाँ निम्नलिखित हैं
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सुरक्षा सुधार: संसद और संवेदनशील सरकारी संस्थानों की सुरक्षा को मजबूत करना।
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राजनीतिक स्थिरता: विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच समन्वय स्थापित कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बनाए रखना।
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सामाजिक विकास: बेरोजगारी, असमानता और युवा असंतोष जैसी सामाजिक समस्याओं को दूर करने के लिए नीतियाँ लागू करना।
सुषिला कार्की की नियुक्ति के साथ ही नेपाल में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हुई। उनकी सरकार ने तुरंत सुरक्षा समीक्षा और रणनीतियों को लागू करना शुरू किया, ताकि भविष्य में इस तरह की हिंसक घटनाओं को रोका जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुषिला कार्की का नेतृत्व नेपाल के लिए राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक सुधार और सामाजिक संतुलन लाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। उनकी नियुक्ति ने देश में यह संदेश भी दिया कि नेपाल की लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुरक्षित और मजबूत है, और सरकार जनता की सुरक्षा और कल्याण के लिए गंभीर है।
11 सितंबर को, सुषिला कार्की को नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। वह नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सख्त नीतियों के लिए जानी जाती हैं। उनकी नियुक्ति के बाद, राष्ट्रपति ने संसद को भंग कर दिया और 5 मार्च 2026 को नए चुनावों की घोषणा की।
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और नेपाल की स्थिति
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया
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संयुक्त राष्ट्र (UN) संयुक्त राष्ट्र ने हमले को लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला करार दिया और सभी देशों से आग्रह किया कि वे नेपाल की सुरक्षा और स्थिरता के समर्थन में खड़े हों।
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पड़ोसी देश भारत और चीन सहित नेपाल के पड़ोसी देशों ने शोक व्यक्त करते हुए नेपाल को सुरक्षा सहायता और राजनीतिक समर्थन देने का आश्वासन दिया।
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अंतर्राष्ट्रीय मीडिया वैश्विक मीडिया ने इस हमले को व्यापक कवरेज दिया, जिससे नेपाल पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान बढ़ गया। विशेषज्ञों ने इसे देश की राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा व्यवस्था की चुनौती के रूप में देखा।
नेपाल की आंतरिक स्थिति
हमले के बाद नेपाल में सुरक्षा कड़ी कर दी गई। सेना और पुलिस बल ने संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त बढ़ाई, और संसद भवन तथा अन्य सरकारी संस्थानों की सुरक्षा में आधुनिक तकनीक को शामिल किया गया।
सामाजिक स्तर पर, जनता में भय और चिंता का माहौल था। कई शहरों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर अतिरिक्त सुरक्षा तैनात की।
राजनीतिक दृष्टि से, प्रधानमंत्री के इस्तीफे और सुषिला कार्की की नियुक्ति ने देश में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी की और राजनीतिक स्थिरता लौटाने की दिशा में एक कदम बढ़ाया।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय समर्थन और आंतरिक सुधार दोनों ही नेपाल के लिए भविष्य में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह घटना नेपाल के लिए चेतावनी भी है कि राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर सुरक्षा व्यवस्था देश को गंभीर संकट में डाल सकती है।
इस घटनाक्रम ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। भारत ने नेपाल के लोकतांत्रिक प्रक्रिया में स्थिरता की कामना की है। चीन ने भी नेपाल से आंतरिक मुद्दों को शीघ्र सुलझाने की अपील की है। नेपाल में युवाओं की बेरोजगारी दर लगभग 11% है, और लाखों लोग रोजगार के लिए विदेशों में पलायन कर चुके हैं।
नेपाल की संसद पर हुआ हमला देश की राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक है। सुषिला कार्की की नियुक्ति एक नई उम्मीद लेकर आई है, लेकिन यह भी एक चुनौतीपूर्ण समय है। नेपाल को लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने और जनता के विश्वास को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।
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