पंजाब में बाढ़ राहत किसानों की आपत्ति और संघर्ष

पंजाब में 2025 की बाढ़ ने राज्य के किसानों को भीषण संकट में डाल दिया है। लगातार बारिश और नदियों के उफान के कारण लगभग 1,400 गांव जलमग्न हो गए, जिससे 3.5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए और 3.71 लाख एकड़ से अधिक कृषि भूमि डूब गई। इस विनाशकारी बाढ़ के बाद, राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने राहत पैकेज की घोषणा की, लेकिन किसानों और विपक्षी दलों ने इन उपायों को अपर्याप्त और अपमानजनक बताया है।
राज्य सरकार की राहत योजनाएँ
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कृषि राहत पैकेज
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बाढ़ से प्रभावित किसानों को प्रति एकड़ ₹20,000 की राहत राशि दी गई।
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इसमें मुख्य रूप से फसल के नुकसान की भरपाई और खेत में जमा कीचड़ और मलबा निकालने की सुविधा शामिल है।
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राहत राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में जमा की जाती है, ताकि उन्हें तुरंत आर्थिक सहारा मिल सके।
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मृतक परिवारों के लिए अनुग्रह राशि
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बाढ़ के दौरान जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों के लिए ₹4 लाख की अनुग्रह राशि घोषित की गई।
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यह राशि परिवारों के जीवनयापन में मदद और उन्हें वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से है।
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आपातकालीन राहत और बचाव कार्य
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जलमग्न इलाकों में राहत शिविर स्थापित किए गए हैं।
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स्थानीय प्रशासन और राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने नावों और वॉटर स्पोर्ट्स उपकरणों की मदद से फंसे हुए लोगों को सुरक्षित निकाला।
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राहत शिविरों में प्राथमिक चिकित्सा, भोजन और पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की गई।
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सड़कों और आधारभूत संरचना की मरम्मत
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बाढ़ के कारण क्षतिग्रस्त सड़कों और पुलों की तुरंत मरम्मत की योजना बनाई गई।
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इससे प्रभावित क्षेत्रों में संपर्क और आपूर्ति सुनिश्चित होती है, जिससे राहत कार्य तेज़ी से चल सके।
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अन्य सहायता और सरकारी सहयोग
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स्कूल और सामुदायिक केंद्रों में अस्थायी आश्रय और राहत केंद्र बनाए गए।
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स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित लोगों को मुफ्त दवा, कपड़े और आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराई
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केंद्र सरकार की राहत पैकेज पर विवाद
2025 की पंजाब बाढ़ के बाद केंद्र सरकार ने प्रभावित किसानों और आम जनता के लिए ₹1,600 करोड़ का राहत पैकेज घोषित किया। इस पैकेज का उद्देश्य बाढ़ से हुई फसल, घर और आधारभूत संरचना के नुकसान को कम करना था। हालांकि, इस पैकेज को लेकर किसानों और विपक्षी दलों में कई तरह की आलोचना और विवाद उत्पन्न हो गया।
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किसानों का आरोप – राशि अपर्याप्त
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किसान यूनियनों का कहना है कि बाढ़ से हुए वास्तविक नुकसान का आकलन लगभग ₹20,000 करोड़ है, जबकि केंद्र सरकार ने केवल ₹1,600 करोड़ का पैकेज घोषित किया।
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किसानों का मानना है कि यह राशि उनकी फसलों, भूमि और घरों की क्षति के मुकाबले बहुत कम है और उन्हें पर्याप्त मदद नहीं मिलेगी।
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सरकारी वितरण प्रक्रिया पर सवाल
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कई किसान संघों ने यह भी कहा कि राहत राशि का वितरण पारदर्शी नहीं होगा।
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उनका आरोप है कि स्थानीय प्रशासन और बैंकिंग प्रणाली में देरी या भ्रष्टाचार के कारण वास्तविक लाभार्थियों तक पैसा नहीं पहुंचेगा।
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राजनीतिक विरोध और बयानबाजी
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आम आदमी पार्टी के पंजाब अध्यक्ष और अन्य राजनीतिक नेता इस पैकेज को “अपमानजनक” और “किसानों के साथ मजाक” बताते हुए केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं।
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कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने भी कहा कि पंजाब हमेशा देश की खाद्य सुरक्षा में योगदान देता रहा है, लेकिन इस आपदा के समय केंद्र ने इसकी उपेक्षा की।
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विशेष अनुरोध – सीधे बैंक खातों में राशि
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किसानों और विपक्षी दलों की मांग है कि राहत राशि सीधे प्रभावित किसानों के बैंक खातों में जमा की जाए।
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इससे यह सुनिश्चित होगा कि पैकेज का वास्तविक लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे और बिचौलियों के कारण राशि कम न हो।
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अन्य विवादित मुद्दे
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राहत राशि के अलावा, पैकेज में बाढ़ नियंत्रण और जल निकासी की दीर्घकालिक योजनाओं का उल्लेख नहीं है।
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किसानों का कहना है कि केवल आर्थिक पैकेज पर्याप्त नहीं है, बल्कि बाढ़ के कारणों और संरचनात्मक समस्याओं का स्थायी समाधान भी जरूरी है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंजाब के दौरे के दौरान ₹1,600 करोड़ का बाढ़ राहत पैकेज घोषित किया। लेकिन राज्य सरकार और किसानों ने इसे अपर्याप्त और अपमानजनक बताया है। किसान यूनियनों का कहना है कि यह राशि किसानों की वास्तविक क्षति की तुलना में नगण्य है। उन्होंने मांग की है कि यह राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में डाली जाए।
किसानों की आपत्ति और विरोध
1. राहत राशि अपर्याप्त – मुख्य आपत्ति
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किसानों का आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा घोषित राशि उनके वास्तविक नुकसान के अनुपात में बहुत कम है।
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उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार ने ₹1,600 करोड़ का पैकेज और राज्य सरकार ने प्रति एकड़ ₹20,000 की राहत राशि घोषित की, जबकि वास्तविक नुकसान लगभग ₹20,000 करोड़ का है।
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किसानों का कहना है कि यह राशि उनकी फसल और घरों के नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है।
2. सरकारी वितरण प्रक्रिया पर सवाल
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किसानों और किसान संघों ने राहत राशि के पारदर्शी वितरण पर भी सवाल उठाए हैं।
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उनका मानना है कि स्थानीय प्रशासन में देरी या भ्रष्टाचार के कारण वास्तविक लाभार्थियों तक पैसा नहीं पहुंचेगा।
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उन्होंने यह मांग की कि राशि सीधे उनके बैंक खातों में जमा की जाए।
3. राजनीतिक समर्थन और विरोध
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आम आदमी पार्टी के पंजाब अध्यक्ष और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने इस पैकेज को “अपमानजनक” और “किसानों के साथ मजाक” बताया।
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कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि पंजाब हमेशा देश की खाद्य सुरक्षा में योगदान देता रहा है, लेकिन इस आपदा के समय केंद्र ने उसकी उपेक्षा की।
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किसान यूनियनों और स्थानीय नेताओं ने बड़े पैमाने पर धरने और प्रदर्शन आयोजित किए।
4. स्थानीय संघर्ष और जन जागरूकता
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कई गांवों में किसानों ने नहरों और जल निकासी मार्गों के पास विरोध प्रदर्शन किए।
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उनका कहना है कि केवल आर्थिक मदद पर्याप्त नहीं है, बल्कि बाढ़ के कारणों को समझकर स्थायी समाधान करना भी जरूरी है।
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किसानों ने सरकारी अधिकारियों के साथ बैठकें कर राहत योजनाओं और वितरण प्रक्रिया में सुधार की मांग की।
5. सकारात्मक पहलें और सहयोग
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कुछ किसानों ने राहत पैकेज की सीमाओं को देखते हुए स्थानीय समुदायों और स्वयंसेवी संस्थाओं से सहयोग प्राप्त किया।
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युवाओं और स्थानीय संगठनों ने राहत सामग्री एकत्र कर प्रभावित किसानों तक पहुँचाई।
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यह विरोध और आपत्ति केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में बाढ़ नियंत्रण और संरचनात्मक सुधारों की दिशा में भी जागरूकता बढ़ाने का माध्यम बनी।
किसान यूनियनों और विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के राहत पैकेज की आलोचना की है। आम आदमी पार्टी के पंजाब अध्यक्ष अमन अरोड़ा ने इसे “अपमानजनक” करार दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पंजाब के लोगों के साथ क्रूर मजाक करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वास्तविक नुकसान लगभग ₹20,000 करोड़ का है, जबकि केंद्र ने केवल ₹1,600 करोड़ की घोषणा की है।
कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की और इसे “धोखा” और “मजाक” बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब ने हमेशा देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन इस संकट के समय केंद्र ने उसकी उपेक्षा की है। The Times of India
बाढ़ के कारण संरचनात्मक समस्याएँ
1. नहरों और जल निकासी प्रणाली की खराब स्थिति
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पंजाब की कई नहरें, जैसे कि हंसी-बुटाना नहर, बार-बार बाढ़ का कारण बनती हैं।
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ये नहरें कभी-कभी नदी के प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित कर देती हैं, जिससे बारिश के पानी का निकास नहीं हो पाता।
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विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि नहरों में सिफ़न (सुरंग) और अतिरिक्त जल निकासी मार्ग बनाए जाने चाहिए ताकि जल का प्रवाह सुचारू रहे।
2. पुराने पुल और सड़कें
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बाढ़ के दौरान कई पुराने पुल और सड़कों को क्षति पहुँची।
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सड़कें जलमग्न हो जाने से राहत और बचाव कार्य धीमे हो जाते हैं।
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संरचनात्मक मजबूती और आधुनिक इंजीनियरिंग के उपाय अपनाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में बाढ़ में संपर्क टूटने की समस्या न हो।
3. अल्प विकसित जलाशय और बांध
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पंजाब में कई जलाशय और बांध पुराने हैं और उनमें पर्याप्त क्षमता नहीं है।
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भारी बारिश के दौरान जलाशय ओवरफ्लो हो जाते हैं, जिससे आसपास के गांव और खेत जलमग्न हो जाते हैं।
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विशेषज्ञों का सुझाव है कि इन बांधों और जलाशयों का नवीनीकरण और विस्तार किया जाए।
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कई इलाकों में कृषि भूमि का प्राकृतिक ढाल कम है और पानी लंबे समय तक खेतों में ठहरा रहता है।
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सिंचाई और जल निकासी की उचित योजना नहीं होने के कारण फसलें जलमग्न हो जाती हैं।
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आधुनिक जल प्रबंधन तकनीक और खेतों में उन्नत ड्रेनेज प्रणाली अपनाना जरूरी है।
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सहयोग और एकजुटता
राजस्थान के श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और मेवात क्षेत्रों के समुदायों ने पंजाब के किसानों के लिए राहत सामग्री एकत्र की है। मस्जिदों और स्थानीय संगठनों ने खाद्यान्न, कपड़े और नकद दान एकत्र किए हैं। युवाओं ने ट्रैक्टरों और वाहनों के माध्यम से इन सामग्री को पंजाब भेजा है, जो आपसी सहयोग और एकजुटता का प्रतीक है।
पंजाब में आई बाढ़ ने किसानों के लिए एक गंभीर संकट उत्पन्न किया है। राज्य और केंद्र सरकारों की राहत योजनाएँ किसानों की वास्तविक क्षति के अनुपात में अपर्याप्त हैं। किसान यूनियनों और विपक्षी दलों की मांग है कि राहत राशि सीधे किसानों के खातों में डाली जाए और बाढ़ के कारणों की स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाए जाएं। साथ ही, राज्य और केंद्र सरकारों को मिलकर बाढ़ नियंत्रण और जल निकासी की संरचनाओं को मजबूत करने की आवश्यकता है।
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