भगवद् गीता अध्याय 16 दैवासुर सम्पद्विभाग योग — जीवन की दो विपरीत शक्तियों का रहस्य

भगवद् गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला का शाश्वत मार्गदर्शन है। प्रत्येक अध्याय में मानव जीवन की जटिलताओं को समझाने का प्रयास किया गया है।
गीता का 16वाँ अध्याय “दैवासुर सम्पद्विभाग योग” कहलाता है। यह अध्याय मनुष्य में उपस्थित दैवी (सत्कर्म और सद्गुणों वाली) प्रवृत्तियों और आसुरी (अहंकार, क्रोध, वासनाओं से ग्रसित) प्रवृत्तियों का विस्तारपूर्वक वर्णन करता है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि मनुष्य के भीतर ये दोनों प्रवृत्तियाँ निरंतर संघर्ष करती हैं। जो व्यक्ति दैवी गुणों का अनुसरण करता है वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है, जबकि आसुरी प्रवृत्तियाँ उसे बंधन और अधोगति की ओर ले जाती हैं।
अध्याय का नाम और महत्व
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संस्कृत नाम दैवासुर सम्पद्विभाग योग (दैव–आसुर सम्पत्ति का विभाजन)
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अध्याय क्रमांक 16
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श्लोक संख्या 24 श्लोक
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मुख्य विषय मनुष्य के गुणों का वर्गीकरण — दैवी (सत्कर्म और सद्गुण) तथा आसुरी (अधर्म और दुर्गुण)।
नाम से ही स्पष्ट है कि इस अध्याय में दैवी सम्पत्ति (निर्भयता, दया, सत्य, संयम, क्षमा आदि) और आसुरी सम्पत्ति (अहंकार, क्रोध, लोभ, कपट, हिंसा आदि) का विभाजन कर बताया गया है।
अध्याय का महत्व
यह अध्याय गीता के सबसे व्यावहारिक और नैतिक शिक्षाओं से भरपूर अध्यायों में से एक है।
1. मानव स्वभाव का विश्लेषण
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भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि हर मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं –
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दैवी (सकारात्मक, आत्मोन्नति की ओर ले जाने वाली)
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आसुरी (नकारात्मक, पतन की ओर ले जाने वाली)।
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यही प्रवृत्तियाँ उसके जीवन की दिशा और गति तय करती हैं।
2. जीवन के दो मार्गों का ज्ञान
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दैवी गुण अपनाने से मनुष्य मोक्ष और आत्मिक शांति प्राप्त करता है।
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आसुरी गुण अपनाने से बंधन, दुख और अधोगति मिलती है।
3. आधुनिक जीवन के लिए प्रासंगिकता
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आज के युग में भी यह अध्याय उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि मनुष्य का संघर्ष बाहर नहीं, भीतर के दैवी और आसुरी गुणों के बीच है।
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यदि व्यक्ति दैवी गुणों को विकसित करता है तो वह समाज, परिवार और राष्ट्र का कल्याण कर सकता है।
4. आध्यात्मिक मार्गदर्शन
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गीता कहती है कि शास्त्रों और धर्म के मार्गदर्शन के बिना जीवन अधूरा है।
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जो व्यक्ति शास्त्रों को न मानकर अपनी इच्छानुसार चलता है, वह सुख, सिद्धि और मोक्ष किसी को भी प्राप्त नहीं कर सकता।
5. नैतिक शिक्षा
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यह अध्याय बताता है कि केवल पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांड ही नहीं, बल्कि आचरण और चरित्र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
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सच्चा धर्म वही है जिसमें दया, सत्य, अहिंसा, संयम और सेवा हो
दैवी सम्पत्ति के गुण (दैवी प्रवृत्तियाँ)
1. अभय (निर्भयता)
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सत्य और धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में भयभीत नहीं होता।
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अभय का अर्थ है – भीतर से दृढ़ विश्वास कि भगवान साथ हैं।
2. सत्त्व-सम्पत्ति (हृदय की शुद्धि)
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मन और हृदय में स्वार्थ, छल, कपट और ईर्ष्या न हो।
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शुद्ध हृदय वाले व्यक्ति के कार्य सदैव कल्याणकारी होते हैं।
3. ज्ञानयोग अभ्यास
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आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना।
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केवल भौतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान भी अर्जित करना।
4. दानशीलता
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दूसरों की मदद करना, परोपकार करना, केवल धन ही नहीं बल्कि समय, ज्ञान और सहयोग देना भी दान है।
5. दम (इन्द्रिय-निग्रह)
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अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करना।
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इच्छाओं और वासनाओं पर काबू पाना।
6. यज्ञ आचरण
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निःस्वार्थ भाव से भगवान और समाज के कल्याण के लिए कार्य करना।
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केवल अग्नि-यज्ञ ही नहीं, बल्कि सेवा भी यज्ञ है।
7. स्वाध्याय
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शास्त्रों का अध्ययन करना और उनके ज्ञान को जीवन में उतारना।
8. तप (साधना और अनुशासन)
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आत्मसंयम और साधना द्वारा मानसिक और शारीरिक शुद्धि।
9. अहिंसा
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किसी भी प्राणी को दुख न देना।
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विचार, वाणी और कर्म से अहिंसक रहना।
10. सत्य
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हर स्थिति में सत्य बोलना और छल-कपट से दूर रहना।
11. अक्रोध (क्रोध न करना)
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धैर्य और शांति बनाए रखना।
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क्रोध पर नियंत्रण ही अक्रोध है।
12. त्याग
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लोभ और आसक्ति छोड़कर निःस्वार्थ भाव से कर्म करना।
13. शांति (मन की स्थिरता)
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मन का संतुलन बनाए रखना।
14. अपैशुन्यम् (निन्दा का अभाव)
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दूसरों की बुराई या निन्दा न करना।
15. करुणा (दयालुता)
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सभी प्राणियों के प्रति करुणाभाव रखना।
16. मृदुता
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कोमल वाणी, नम्रता और मधुर व्यवहार।
17. लज्जा (संकोच एवं मर्यादा)
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अनुचित कार्यों से लज्जित होना और मर्यादा में रहना।
18. अचापलता
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कार्यों में स्थिरता, उतावलापन न होना।
19. तेज (आंतरिक शक्ति)
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आत्मविश्वास और सत्य के लिए खड़े होने का साहस।
20. क्षमाशीलता
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दूसरों की गलतियों को क्षमा कर देना।
21. धैर्य
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कठिनाइयों में भी स्थिर बने रहना।
22. शौच (शुद्धि)
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आंतरिक और बाहरी शुद्धि।
23. अद्रोह (द्वेष का अभाव)
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किसी से बैर या द्वेष न रखना।
24. अतिमानिता (अहंकार का अभाव)
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स्वयं को श्रेष्ठ मानने का भाव न होना।
श्रीकृष्ण गीता में बताते हैं कि दैवी सम्पत्ति वाले व्यक्ति में निम्न गुण होते हैं। ये व्यक्ति को सत्य, शांति और मोक्ष की ओर ले जाते हैं—
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अभय (निर्भयता) – धर्मपरायण व्यक्ति कभी भी सत्य मार्ग से डरता नहीं।
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सत्त्व-सम्पत्ति (हृदय की शुद्धि) – मन में पवित्रता और द्वेष का अभाव।
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ज्ञानयोग अभ्यास – आत्मज्ञान की खोज।
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दानशीलता – दूसरों की भलाई के लिए त्याग करना।
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संयम और इन्द्रियनिग्रह – इच्छाओं और कामनाओं पर नियंत्रण।
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सत्य भाषण – सदैव सत्य बोलना और छल से दूर रहना।
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अहिंसा – किसी भी प्राणी को दुख न पहुँचाना।
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शांति और क्षमा – क्रोध को शांत करना और क्षमाशील होना।
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धैर्य और सहनशीलता – कठिनाइयों में भी स्थिर रहना।
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स्वाध्याय – शास्त्रों का अध्ययन और आत्मचिंतन।
इन दैवी गुणों से युक्त व्यक्ति समाज में सम्मानित होता है और अंततः परमात्मा की शरण पाता है।
आसुरी सम्पत्ति के गुण (आसुरी प्रवृत्तियाँ)
इसके विपरीत, आसुरी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं—
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दम्भ (दंभ और दिखावा) – झूठे अहंकार से भरा हुआ।
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अभिमान और अहंकार – स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानना।
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क्रोध और हिंसा – छोटी-सी बात पर उग्र होना।
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अज्ञान – धर्म और शास्त्रों की उपेक्षा।
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कामवासना और लोभ – वासनाओं के अधीन जीवन जीना।
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द्वेषभाव – दूसरों की प्रगति से जलन।
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असत्य और छल – दूसरों को धोखा देना।
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निर्दयता – प्राणियों पर दया न करना।
ऐसे व्यक्ति का जीवन अशांत होता है और वह पुनर्जन्म के चक्र में फँसता है।
दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का विभाजन
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दैवी सम्पत्ति (दैवी गुण)
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आसुरी सम्पत्ति (आसुरी गुण)
इन दोनों का स्पष्ट अंतर ही अध्याय 16 का मुख्य आधार है।
1. दैवी सम्पत्ति (दैवी गुण)
दैवी गुण मनुष्य को सत्य, शांति, धर्म और मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
इनमें शामिल हैं:
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अभय (निर्भयता)
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हृदय की शुद्धि
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आत्मज्ञान की खोज
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दानशीलता और परोपकार
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संयम और इन्द्रिय-निग्रह
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सत्य भाषण
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अहिंसा और करुणा
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शांति और क्षमा
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स्वाध्याय (शास्त्र अध्ययन)
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धैर्य, नम्रता और करुणा
दैवी गुणों वाले लोग आत्मोन्नति, लोककल्याण और परमात्मा की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं।
2. आसुरी सम्पत्ति (आसुरी गुण)
आसुरी प्रवृत्तियाँ मनुष्य को अधर्म, अधोगति और बंधन की ओर ले जाती हैं।
इनमें शामिल हैं:
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दम्भ और दिखावा
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अहंकार और अभिमान
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क्रोध और हिंसा
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अज्ञान और अधर्म
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कामवासना और लोभ
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द्वेष और ईर्ष्या
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असत्य और छल
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निर्दयता और कठोरता
आसुरी गुणों से युक्त लोग समाज को नुकसान पहुँचाते हैं और स्वयं भी दुखी रहते हैं।
विभाजन का सार
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दैवी सम्पदा → मोक्ष और आत्मिक शांति का मार्ग।
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आसुरी सम्पदा → बंधन, दुख और पुनर्जन्म का मार्ग।
भगवान कहते हैं –
दैवी गुणों को अपनाने वाला मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।
आसुरी गुणों के अधीन रहने वाला मनुष्य बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फँसता है।
आधुनिक संदर्भ में
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दैवी गुण → ईमानदारी, दया, सेवा, सादगी, संयम।
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आसुरी गुण → भ्रष्टाचार, लालच, स्वार्थ, हिंसा, धोखाधड़ी।
आज की दुनिया में यह विभाजन हमें चेतावनी देता है कि कौन-सा मार्ग हमें शांति देगा और कौन-सा मार्ग विनाश की ओर ले जाएगा
भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं—
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दैवी सम्पदा मोक्ष की ओर ले जाती है।
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आसुरी सम्पदा बंधन और अधोगति की ओर ले जाती है।
यही कारण है कि यह अध्याय जीवन में गुणों के चुनाव का मार्गदर्शन करता है।
शास्त्र का महत्व
इस अध्याय के अंतिम श्लोकों में भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति शास्त्रों को त्यागकर अपनी इच्छानुसार चलता है, वह न सुख, न सिद्धि और न ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
इसलिए गीता का संदेश स्पष्ट है— जीवन में शास्त्रों के मार्गदर्शन का पालन अनिवार्य है।
आधुनिक संदर्भ में दैवी और आसुरी गुण
आज की दुनिया में भी यह अध्याय उतना ही प्रासंगिक है जितना अर्जुन के समय था।
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दैवी गुण सत्यनिष्ठा, नैतिकता, ईमानदारी, दया, सेवा भावना।
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आसुरी गुण भ्रष्टाचार, लालच, हिंसा, स्वार्थ, ईर्ष्या।
उदाहरण के लिए—
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एक नेता यदि दैवी गुणों से युक्त है तो वह जनता की सेवा करेगा, परंतु आसुरी प्रवृत्तियों वाला नेता भ्रष्टाचार करेगा।
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एक व्यापारी दैवी गुणों से व्यापार करेगा तो ग्राहकों का विश्वास पाएगा, जबकि आसुरी गुणों वाला धोखाधड़ी करेगा।
जीवन के लिए शिक्षा
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आत्मचिंतन करें – अपने भीतर देखें कि कौन-से गुण प्रबल हैं।
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दैवी गुणों को विकसित करें – जैसे अहिंसा, दया, सत्य, संयम।
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आसुरी गुणों से दूर रहें – अहंकार, क्रोध, लोभ को नियंत्रित करें।
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शास्त्र और गुरु का मार्गदर्शन लें – ताकि सही दिशा मिल सके।
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संतुलित जीवन जिएँ – भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन।
भगवद् गीता का 16वाँ अध्याय हमें यह सिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक युद्ध बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है।
दैवी और आसुरी गुण हमारे भीतर ही मौजूद हैं। हमें यह चुनाव करना है कि किस मार्ग को अपनाएँ।
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दैवी गुण अपनाने से आत्मशांति और मोक्ष मिलता है।
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आसुरी गुण अपनाने से दुख, भय और बंधन मिलता है।
इस प्रकार, दैवासुर सम्पद्विभाग योग जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग दिखाता है।
Nest –
