भगवद् गीता अध्याय 17 श्रद्धात्रयविभाग योग का सम्पूर्ण सार

भगवद् गीता का सत्रहवाँ अध्याय “श्रद्धात्रयविभाग योग” कहलाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने श्रद्धा, आस्था, यज्ञ, तप और दान की तीन-तीन प्रवृत्तियों (सात्त्विक, राजसिक और तामसिक) का विस्तृत विवेचन किया है। यह अध्याय हमें यह समझाता है कि मनुष्य की आस्था और उसके कर्म उसकी प्रकृति के अनुसार होते हैं। जैसा उसका स्वभाव और संस्कार है, वैसा ही उसकी श्रद्धा और उसी प्रकार के फल उसे प्राप्त होते हैं।
यह अध्याय उन साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है, जो यह जानना चाहते हैं कि सही श्रद्धा और सही कर्म का मार्ग क्या है।
अध्याय की पृष्ठभूमि

16वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का विस्तार से वर्णन किया था। वहाँ यह स्पष्ट हुआ कि शास्त्रों के अनुसार जीवन जीने वाले लोग दैवी गुणों से संपन्न होते हैं और मोक्ष की ओर बढ़ते हैं, जबकि आसुरी गुणों से युक्त लोग बंधन और विनाश की ओर जाते हैं।
यह सुनकर अर्जुन के मन में एक शंका उत्पन्न होती है—
“हे भगवान! यदि कोई मनुष्य शास्त्रों की मर्यादा का पालन न करके अपनी श्रद्धा के अनुसार यज्ञ, तप या उपासना करता है, तो उसका क्या होगा? उसकी श्रद्धा सात्त्विक है, राजसिक है या तामसिक?”
इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने 17वें अध्याय का उपदेश दिया।
इस अध्याय में वे बताते हैं कि—
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मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव और संस्कारों के अनुसार होती है।
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श्रद्धा मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।
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जैसे-जैसे श्रद्धा का स्वरूप होता है, वैसे ही उसका आहार, यज्ञ, तप और दान भी उसी गुण से प्रभावित होता है।
इस प्रकार, 17वाँ अध्याय हमें यह समझाने के लिए है कि सच्ची और सात्त्विक श्रद्धा ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है, जबकि राजसिक और तामसिक श्रद्धा केवल बंधन और दुःख का कारण बनती है।
16वें अध्याय में भगवान ने दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का वर्णन किया। वहाँ अर्जुन के मन में यह प्रश्न उठता है कि जो लोग शास्त्रों को त्यागकर अपनी श्रद्धा के अनुसार यज्ञ, तप या दान करते हैं, उनका क्या होता है? इसी प्रश्न का उत्तर श्रीकृष्ण 17वें अध्याय में देते हैं।
श्रद्धा के तीन प्रकार
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
“शास्त्रविहित न होकर भी लोग श्रद्धा के अनुसार यज्ञ और उपासना करते हैं। उनकी श्रद्धा तीन प्रकार की होती है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।”
1. सात्त्विक श्रद्धा
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सात्त्विक प्रकृति वाले लोग देवताओं और परमात्मा की उपासना करते हैं।
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उनका मन शुद्ध, शांत और कल्याणकारी भाव से भरा होता है।
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वे नियम, संयम और शास्त्रों के अनुसार कर्म करते हैं।
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उनके यज्ञ, तप और दान निष्काम भाव से होते हैं।
2. राजसिक श्रद्धा
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राजसिक लोग यक्ष, राक्षस और शक्तिशाली भूत-प्रेत आदि की पूजा करते हैं।
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उनके कर्म में फल की इच्छा और अहंकार जुड़ा रहता है।
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उनका ध्यान दिखावे और मान-सम्मान पर रहता है।
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राजसिक दान और तप स्वार्थ से प्रेरित होता है।
3. तामसिक श्रद्धा
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तामसिक लोग भूत-प्रेत, पिशाच और अंधकारमय शक्तियों की पूजा करते हैं।
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वे बिना शास्त्र-विहित नियम के कठोर तप या क्रूर कर्म करते हैं।
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कभी-कभी वे स्वयं और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाले कार्य करते हैं।
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तामसिक श्रद्धा अज्ञान और मोह से प्रेरित होती है।
भोजन (आहार) के तीन प्रकार
भगवान श्रीकृष्ण आहार को भी तीन गुणों के आधार पर बाँटते हैं।
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सात्त्विक आहार
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रसयुक्त, मधुर, स्थिर और स्वास्थ्यवर्धक होता है।
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दूध, फल, सब्ज़ियाँ, ताजे अनाज, हल्का भोजन।
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यह आयु, बल, स्वास्थ्य और प्रसन्नता बढ़ाता है।
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राजसिक आहार
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अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन, गरम, सूखा या झुलसाने वाला।
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यह दुःख, रोग और अस्थिरता को बढ़ाता है।
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तामसिक आहार
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बासी, गला-सड़ा, दुर्गंधयुक्त, अशुद्ध भोजन।
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यह आलस्य, प्रमाद और मानसिक जड़ता को जन्म देता है।
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यज्ञ के तीन प्रकार
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सात्त्विक यज्ञ
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शास्त्रविहित विधि से, निष्काम भाव से, उचित आस्था के साथ किया गया यज्ञ।
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इसमें केवल कर्तव्य और ईश्वर की प्रसन्नता हेतु कर्म होता है।
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राजसिक यज्ञ
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केवल दिखावे, मान-सम्मान या फल की प्राप्ति के लिए किया गया यज्ञ।
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इसमें आडंबर और प्रदर्शन प्रमुख होते हैं।
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तामसिक यज्ञ
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शास्त्रों के विरुद्ध, बिना मंत्रों और बिना श्रद्धा के किया गया यज्ञ।
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यह अज्ञान से प्रेरित होता है।
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तप (तपस्या) के तीन प्रकार
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शारीरिक तप
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देव, ब्राह्मण, गुरु और विद्वानों का सम्मान करना।
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शुद्धता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा का पालन करना।
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वाचिक तप
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सत्य बोलना, प्रिय वचन कहना।
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कठोर शब्दों से बचना और स्वाध्याय करना।
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मानसिक तप
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मन की शांति, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और शुद्ध विचार रखना।
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अब तीनों गुणों के अनुसार तप—
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सात्त्विक तप → श्रद्धा और दृढ़ निश्चय से किया गया।
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राजसिक तप → दिखावे और सम्मान की इच्छा से किया गया।
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तामसिक तप → मूर्खता, जिद और दूसरों को कष्ट देने की भावना से किया गया।
दान के तीन प्रकार
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सात्त्विक दान
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भगवान श्रीकृष्ण ने 17वें अध्याय में दान के तीन प्रकार बताए हैं – सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। इनमें सबसे श्रेष्ठ है सात्त्विक दान, क्योंकि यह आत्मिक शांति, पुण्य और ईश्वर की कृपा का मार्ग खोलता है।
सात्त्विक दान की परिभाषा
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सात्त्विक दान वह है जो योग्य व्यक्ति को, उचित समय और स्थान पर, बिना किसी फल की अपेक्षा के किया जाता है।
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इसमें दाता केवल कर्तव्य भाव से दान करता है, न कि दिखावे या प्रसिद्धि के लिए।
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इसका उद्देश्य सिर्फ सहायता और कल्याण होता है।
सात्त्विक दान की विशेषताएँ
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निष्काम भाव – दान करते समय प्रतिफल की कोई आशा नहीं होती।
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उचित पात्र को दान – जरूरतमंद, योग्य, धर्मनिष्ठ या विद्वान को दान दिया जाता है।
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समय और स्थान की मर्यादा – दान ऐसे समय पर और ऐसी जगह किया जाए जहाँ उसका वास्तविक लाभ हो।
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सम्मान और श्रद्धा के साथ – दान देते समय अपमान या अहंकार नहीं दिखाना चाहिए।
सात्त्विक दान के उदाहरण
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शिक्षा, अन्न, वस्त्र या चिकित्सा की निःस्वार्थ सहायता करना।
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भूखे को भोजन देना, लेकिन बिना अपमानित किए।
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किसी योग्य छात्र को पढ़ाई में सहयोग करना।
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प्राकृतिक आपदा या संकट में मदद करना, बिना नाम और यश की चाह के।
सात्त्विक दान का फल
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यह आत्मा को शुद्ध करता है और भीतर गहरी संतुष्टि और प्रसन्नता लाता है।
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यह पुण्य को स्थायी बनाता है और जन्म-जन्मांतर तक कल्याणकारी रहता है।
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सात्त्विक दान व्यक्ति को मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
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योग्य व्यक्ति को, उचित समय और स्थान पर, बिना किसी अपेक्षा के किया गया दान।
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इससे पुण्य और आत्मिक संतोष मिलता है।
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राजसिक दान
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फल और प्रतिफल की इच्छा से या दिखावे के लिए किया गया दान।
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यह अस्थिर और क्षणिक फल देने वाला होता है।
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तामसिक दान
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अपात्र व्यक्ति को, अनुचित समय और स्थान पर, अवमानना या दबाव में किया गया दान।
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इससे न पुण्य मिलता है न ही सच्चा संतोष।
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“ॐ तत् सत्” का महत्व
1. ॐ (ओंकार)
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“ॐ” ध्वनि को परमात्मा का मूल स्वरूप माना गया है।
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यह वेदों का प्रारंभिक बीज है और संपूर्ण ब्रह्मांड की आद्य शक्ति का प्रतीक है।
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किसी भी मंत्र, जप, यज्ञ या साधना की शुरुआत “ॐ” से करने पर उसमें दिव्यता और एकाग्रता आती है।
2. तत् (वह)
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“तत्” का अर्थ है — “सब कुछ परमात्मा का है।”
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जब साधक कर्म करते हुए यह भाव रखता है कि उसका कार्य व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परमात्मा को अर्पित है, तब वह निष्काम हो जाता है।
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यह अहंकार को मिटाकर कर्म को पवित्र बनाता है।
3. सत् (सत्य/शुभ)
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“सत्” का अर्थ है सत्य, अस्तित्व और शुभता।
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यह शब्द हर पवित्र कार्य, सच्चे संकल्प और ईश्वर-समर्पण का प्रतीक है।
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सत् से प्रेरित कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते, वे स्थायी और कल्याणकारी फल देते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण अध्याय के अंत में बताते हैं कि वेदों, यज्ञों और तप का मूल मंत्र है “ॐ तत् सत्”।
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ॐ → परमात्मा का मूल प्रतीक है।
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तत् → सब कुछ परमात्मा को समर्पित करने की भावना।
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सत् → सत्य, अस्तित्व और शुभ कर्म का प्रतीक।
इन तीनों शब्दों का उच्चारण और भावना हमें सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
समग्र महत्व
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“ॐ तत् सत्” हर यज्ञ, दान और तप को शुद्धता प्रदान करता है।
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यह हमें स्मरण दिलाता है कि हर कर्म ईश्वर को अर्पित होना चाहिए।
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साधना या दान का उद्देश्य केवल अहंकार या लाभ नहीं, बल्कि सत्य और ईश्वर-समर्पण होना चाहिए।
सरल भाषा में कहा जाए तो “ॐ तत् सत्” जीवन का सूत्र है – ईश्वर की स्मृति (ॐ), समर्पण (तत्) और सत्यनिष्ठा (सत्)।
आधुनिक जीवन में संदेश
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श्रद्धा का महत्व – जीवन में श्रद्धा वही है जो बीज के लिए पानी है। जिस तरह की श्रद्धा होगी, वैसे ही विचार और कर्म होंगे।
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सही आहार का चयन – आधुनिक युग में फास्ट-फूड और प्रोसेस्ड फूड तामसिक और राजसिक प्रवृत्ति को बढ़ाते हैं। सात्त्विक भोजन मन और शरीर दोनों को स्वस्थ रखता है।
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कर्म में निष्काम भाव – यज्ञ, दान और तप यदि निष्काम भाव से हों तो वे आत्मिक उन्नति का कारण बनते हैं।
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शुद्ध वाणी और विचार – वाचिक और मानसिक तप आज की दुनिया में विशेष महत्व रखते हैं। सोशल मीडिया और बातचीत में संयम से ही समाज में शांति रह सकती है।
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दान का सच्चा स्वरूप – आज दान केवल पैसे से नहीं, बल्कि समय, ज्ञान और सहयोग से भी हो सकता है। इसे सात्त्विक भाव से करना चाहिए।
भगवद् गीता का 17वाँ अध्याय हमें यह सिखाता है कि मनुष्य का जीवन उसकी श्रद्धा और आस्था से संचालित होता है। श्रद्धा को सात्त्विक बनाकर ही हम सच्चे अर्थों में आत्मिक शांति और ईश्वर की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। आहार, यज्ञ, तप और दान सभी तभी फलदायी होते हैं जब वे सात्त्विकता, निष्काम भाव और शुद्धता से प्रेरित हों।
“श्रद्धात्रयविभाग योग” का सार यही है कि –
“जैसी श्रद्धा, वैसा ही मनुष्य।”
इसलिए प्रत्येक साधक का कर्तव्य है कि अपनी श्रद्धा को सात्त्विक बनाए और जीवन में सात्त्विक आचरण अपनाए।
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