भगवद गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्म योग – जीवन, मृत्यु और मोक्ष का मार्ग

भगवद गीता हिन्दू धर्मग्रंथों में सबसे महत्वपूर्ण और सार्वकालिक ग्रंथों में से एक है। महाभारत के युद्धभूमि संवाद का हिस्सा, गीता न केवल धर्म और कर्म का ज्ञान देती है, बल्कि जीवन, मृत्यु, मोक्ष और आत्मा के रहस्य को भी उजागर करती है। गीता के आठवें अध्याय को अक्षरब्रह्म योग कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मृत्यु, परमात्मा, और मोक्ष की साधना के रहस्य के बारे में बताया है।
1. अध्याय का परिचय

अष्टम अध्याय को अक्षरब्रह्म योग कहा गया है। ‘अक्षर’ का अर्थ है अमर, अटल और शाश्वत, और ‘ब्रह्म’ का अर्थ है सर्वोच्च आत्मा या परमात्मा। इस योग में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि कैसे मनुष्य अपने जीवन और मृत्यु की घड़ी में अक्षरब्रह्म का ध्यान करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
यह अध्याय 24 श्लोकों का है, जो मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:
-
अमृत और अक्षरब्रह्म का ज्ञान
-
सच्चे भक्ति मार्ग और मृत्यु की घड़ी का महत्व
-
जन्म-मरण और मोक्ष की प्रक्रिया
2. आत्मा और परमात्मा का स्वरूप
आत्मा का स्वरूप
-
अमर और अजर –
आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और न मरती है। यह न तो नष्ट हो सकती है और न ही समाप्त हो सकती है। जैसे शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा उसके अंदर स्थिर रहती है। -
शाश्वत और अविनाशी –
आत्मा का अस्तित्व हमेशा बना रहता है। यह जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से स्वतंत्र है। गीता में इसे “अक्षर” कहा गया है, जिसका अर्थ है जिसका कोई अंत नहीं है। -
अदृश्य और अचिन्त्य –
आत्मा को आंखों से नहीं देखा जा सकता, न ही सामान्य बुद्धि से पूरी तरह समझा जा सकता है। यह केवल अध्यात्मिक साधना, ध्यान और अनुभव से समझ में आता है।
परमात्मा का स्वरूप
-
सर्वव्यापक और सर्वोच्च –
परमात्मा वह शक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह आत्मा के भीतर और बाहर दोनों जगह विद्यमान है। इसे गीता में “अक्षरब्रह्म” कहा गया है। -
अहर्निश संचालनकर्ता –
परमात्मा सभी जीवों और तत्वों का संचालन करता है। संसार में जो कुछ भी घटता है, वह परमात्मा की लीला का हिस्सा है। -
अव्यक्त और अनंत –
परमात्मा का स्वरूप न तो समय और स्थान में बंधा है और न ही किसी रूप या आकार में सीमित है। यह अविनाशी और अनंत है।
आत्मा और परमात्मा का संबंध
-
आत्मा और परमात्मा अलग-अलग हैं, लेकिन आत्मा का अंतिम लक्ष्य परमात्मा से मिलना है।
-
आठवें अध्याय में बताया गया है कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा को समझकर परमात्मा का स्मरण करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
-
यह ज्ञान हमें यह सिखाता है कि संसारिक दुख और भय केवल शरीर के लिए हैं, आत्मा के लिए नहीं।
आधुनिक जीवन में इसका महत्व
-
मानसिक स्थिरता – आत्मा और परमात्मा का ज्ञान व्यक्ति को मानसिक तनाव से दूर रखता है।
-
मृत्यु का भय समाप्त करना – जब हम समझते हैं कि आत्मा अमर है और परमात्मा सर्वोच्च है, तो मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
-
आध्यात्मिक जागरूकता – यह ज्ञान हमें जीवन के उद्देश्य और मोक्ष की ओर प्रेरित करता है।
भगवद गीता के आठवें अध्याय में सबसे पहले आत्मा और परमात्मा की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यह शाश्वत है, अनादि और अनंत है।
-
आत्मा अजर-अमर है, इसलिए इसे न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही कोई उसका अंत कर सकता है।
-
शरीर केवल आत्मा का आवरण है, जैसे वस्त्र। शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा स्थिर रहती है।
-
यही कारण है कि मृत्यु केवल शरीर की समाप्ति है, आत्मा अमर रहती है।
इस शाश्वत ज्ञान के आधार पर अर्जुन को समझाया गया है कि भय, दुःख और चिंता केवल शरीर के लिए हैं, आत्मा के लिए नहीं।
3. मृत्यु के समय का महत्व
अध्याय का एक महत्वपूर्ण विषय है मृत्यु के समय का ध्यान और भक्ति।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति अपनी अंतिम घड़ी में मुझे स्मरण करता है, वह मेरे पास आता है। यह स्मरण केवल शाब्दिक नहीं है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक ध्यान होना चाहिए।
-
मृत्यु के समय किए गए कर्म और स्मरण का भव्य परिणाम होता है।
-
जो व्यक्ति शुद्ध भक्ति और ध्यान के साथ अपने प्राण त्यागता है, उसे मोक्ष मिलता है।
-
अर्जुन को बताया गया कि मृत्युपर्यंत कर्म करना चाहिए और मृत्यु के समय अपने मन को परमात्मा में केंद्रित करना चाहिए।
यह विचार आधुनिक जीवन में भी महत्वपूर्ण है। जीवन के अंतिम क्षणों में यदि हमारा मन ध्यान और भक्ति में केन्द्रित हो, तो मृत्यु का भय समाप्त होता है।
4. कर्म और भक्ति का मार्ग
अष्टम अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्म और भक्ति का संतुलित मार्ग बताया है।
-
व्यक्ति को अपने कर्तव्य और धर्म का पालन करना चाहिए।
-
कर्म करते हुए, मन को परमात्मा में लगाना चाहिए। इसे कर्मयोग और भक्ति योग का संयोजन कहा गया है।
-
मृत्यु के समय, वही व्यक्ति जो सच्ची भक्ति और ध्यान में लगा रहता है, उसे परमात्मा के साथ एकात्मता का अनुभव होता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं:
“जो मनुष्य मेरा नाम याद करते हुए मरा, वही मेरे पास आता है।”
इस श्लोक में यह स्पष्ट होता है कि भक्ति और सच्चा ध्यान मृत्यु के समय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
5. जन्म और मृत्यु का चक्र
अष्टम अध्याय में जन्म-मरण के चक्र (संसार के चक्र) की चर्चा भी है।
-
आत्मा के लिए जन्म और मृत्यु केवल शरीर की सीमाओं से संबंधित हैं, आत्मा इससे मुक्त रहती है।
-
जो व्यक्ति अक्षरब्रह्म का ध्यान करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
-
यह अध्याय मोक्ष की प्रक्रिया और मृत्यु के समय ध्यान के महत्व को उजागर करता है।
यह हमें यह सिखाता है कि जीवन में मृत्यु के प्रति भय नहीं होना चाहिए। यदि हम सदैव ध्यान और भक्ति में लगे रहें, तो मोक्ष निश्चित है।
6. अंतिम श्वास और ध्यान
भगवद गीता के आठवें अध्याय में अंतिम श्वास का ध्यान विशेष रूप से महत्व रखता है।
-
मृत्यु के समय मन का केंद्रित ध्यान परमात्मा में होना चाहिए।
-
ऐसा करने से व्यक्ति की आत्मा सर्वोच्च सत्ता के साथ मिलन करती है।
-
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय मेरे नाम का ध्यान करता है, वह अमरत्व प्राप्त करता है।
यह विचार जीवन में हमें सदैव आध्यात्मिक जागरूक रहने की प्रेरणा देता है।
7. अध्याय का सारांश
1. जीवन और मृत्यु का दृष्टिकोण
-
आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है।
-
शरीर केवल अस्थायी आवरण है। मृत्यु के समय शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा अमर रहती है।
-
इस दृष्टिकोण से मृत्यु को भय और चिंता का कारण नहीं माना जाता।
2. कर्म और भक्ति का महत्व
-
अध्याय यह स्पष्ट करता है कि संसार में कर्म करना आवश्यक है, लेकिन कर्म करते समय मन को परमात्मा में लगाना चाहिए।
-
कर्म के साथ भक्ति का मिलन व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की ओर ले जाता है।
-
अर्थात्, कर्मयोग + भक्ति योग = मोक्ष प्राप्ति का मार्ग।
3. मृत्यु के समय ध्यान
-
अध्याय में कहा गया है कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय परमात्मा का स्मरण करता है, वह उसके पास पहुँचता है।
-
यह ध्यान केवल नाम या शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म का समन्वय होना चाहिए।
-
अंतिम समय में किया गया भक्ति और ध्यान जीवन के अन्य कर्मों का सबसे महत्वपूर्ण फल देता है।
4. जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति
-
अध्याय में जन्म-मरण के चक्र (संसार) का ज्ञान भी दिया गया है।
-
अक्षरब्रह्म का ध्यान और भक्ति करने वाला व्यक्ति इस चक्र से मुक्त हो जाता है।
-
यह हमें यह सिखाता है कि मृत्यु कोई अंत नहीं है, बल्कि आत्मा का परमात्मा में मिलन है।
5. अध्याय का आध्यात्मिक संदेश
-
अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि अविनाशी आत्मा, सच्ची भक्ति और मृत्यु के समय परमात्मा का स्मरण ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है।
-
यह अध्याय हमें जीवन और मृत्यु में भय से मुक्त रहने, कर्म और भक्ति का संतुलन बनाए रखने और मोक्ष प्राप्त करने की शिक्षा देता है।
अष्टम अध्याय का मुख्य संदेश है:
-
आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।
-
मृत्यु के समय भक्ति और ध्यान सर्वोच्च साधन हैं।
-
कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण करें।
-
जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होने का मार्ग अक्षरब्रह्म योग है।
-
अंतिम श्वास में परमात्मा का ध्यान मोक्ष दिलाता है।
यह अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि जीवन और मृत्यु में भय नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि हमारा मन परमात्मा में केन्द्रित है, तो जीवन और मृत्यु दोनों ही सहज और सार्थक हो जाते हैं।
8. आधुनिक जीवन में अक्षरब्रह्म योग
आज के आधुनिक जीवन में भी यह अध्याय अत्यंत प्रासंगिक है।
-
मानसिक तनाव और जीवन की अनिश्चितताओं में ध्यान और भक्ति से स्थिरता मिलती है।
-
मृत्यु और जीवन के चक्र को समझकर हम असत्य और क्षणिक दुखों से मुक्त रह सकते हैं।
-
कर्म और भक्ति का संतुलन बनाए रखना आध्यात्मिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
इस प्रकार, अष्टम अध्याय केवल धर्म और आध्यात्मिक ज्ञान नहीं देता, बल्कि जीवन जीने का सार्थक और स्थायी मार्ग भी दिखाता है।
भगवद गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्म योग हमें जीवन और मृत्यु की सच्चाई, आत्मा की अमरता, और मोक्ष की साधना का ज्ञान देता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि ध्यान, भक्ति और कर्म का संयोजन जीवन को सार्थक बनाता है।
Next –

1 thought on “भगवद गीता के आठवें अध्याय अक्षरब्रह्म योग 8 महत्वपूर्ण शिक्षाएँ पूरी जानकारी यहाँ से पढ़ें”