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लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन से बचने के 7 प्रभावी तरीके – लेट-स्टेज लॉन्च में देरी की पूरी जानकारी

भारत में वाहन लॉन्च में देरी का कारण लेट-स्टेज डिज़ाइन परिवर्तन

भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग में वाहन लॉन्च में देरी एक गंभीर समस्या बन गई है। हाल ही में, वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि लगभग 80% ऑटोमेकर्स को लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन के कारण वाहन लॉन्च में देरी का सामना करना पड़ रहा है। यह समस्या विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के मामले में अधिक गंभीर है।


लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन क्या हैं?

लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन (Late-Stage Engineering Changes) का मतलब उन बदलावों से है जो किसी वाहन या उत्पाद के विकास के अंतिम चरण में किए जाते हैं। सामान्यतः वाहन डिज़ाइन का अधिकांश कार्य प्रारंभिक चरणों – जैसे कि अवधारणा (Concept), डिज़ाइन, प्रोटोटाइप (Prototype), और परीक्षण – में पूरा कर लिया जाता है। लेकिन कई बार अंतिम चरण में, जब उत्पादन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है या मॉडल परीक्षण के लिए तैयार होता है, तब कुछ तकनीकी बदलाव, डिज़ाइन सुधार, या फीडबैक के आधार पर संशोधन करने पड़ते हैं। इन्हें ही लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन कहा जाता है।


लेट-स्टेज परिवर्तन कब होते हैं?

✅ जब प्रोटोटाइप परीक्षण में कोई नई समस्या सामने आती है
✅ जब ग्राहकों या डीलरों से फीडबैक मिलता है
✅ जब सुरक्षा मानकों या सरकारी नियमों में बदलाव होता है
✅ जब उत्पादन प्रक्रिया में कोई तकनीकी अड़चन आती है
✅ जब लागत घटाने या प्रदर्शन बढ़ाने के लिए अंतिम समय में सुधार किया जाता है


लेट-स्टेज परिवर्तन क्यों चुनौतीपूर्ण होते हैं?

  1. उत्पादन पर असर
    अंतिम चरण में बदलाव करने से पहले ही उत्पादन लाइन चालू हो चुकी होती है। ऐसे में बदलाव करने के लिए पूरी प्रक्रिया रोकनी पड़ सकती है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते हैं।

  2. सप्लायर पर दबाव
    घटकों की आपूर्ति पहले से तय होती है। अंतिम समय में बदलाव आने पर सप्लायर को नई डिज़ाइन के अनुसार उत्पादन में बदलाव करना पड़ता है।

  3. गुणवत्ता और विश्वसनीयता में गिरावट का खतरा
    बिना पूरी जाँच के किए गए बदलाव उत्पाद की विश्वसनीयता पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं और ग्राहक शिकायतें बढ़ा सकते हैं।

  4. लॉजिस्टिक्स और मार्केटिंग में बाधा
    यदि वाहन समय पर बाज़ार में नहीं आता तो प्रतिस्पर्धियों से पीछे रह जाने का खतरा होता है।


लेट-स्टेज परिवर्तन और इलेक्ट्रिक वाहन (EV)

इलेक्ट्रिक वाहन जैसे तकनीकी रूप से जटिल उत्पादों में लेट-स्टेज परिवर्तन और भी अधिक होते हैं।

 बैटरी पैक, कंट्रोल यूनिट, सॉफ़्टवेयर अपडेट जैसी चीज़ें अंतिम समय में बदलती हैं।

स्थिरता और पर्यावरण मानकों के चलते डिजाइन में बदलाव आवश्यक हो जाता है।
 उत्पादन सुविधाएँ नई तकनीक के अनुसार ढलने में समय लेती हैं।


कैसे रोकें लेट-स्टेज परिवर्तन?

 प्रारंभिक चरण में सभी तकनीकी और नियामकीय आवश्यकताओं को शामिल करें सप्लायरों को डिज़ाइन प्रक्रिया में शुरू से जोड़

लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन वे बदलाव होते हैं जो वाहन के प्रोटोटाइप या प्री-प्रोडक्शन चरण के बाद किए जाते हैं। आदर्श रूप से, इन परिवर्तनों की संख्या प्री-प्रोडक्शन में 15% से कम, प्रोडक्शन के बाद 8% से कम, और उत्पाद स्थिरीकरण के बाद 3% से कम होनी चाहिए। लेकिन अध्ययन के अनुसार, केवल 6% OEMs इस आदर्श पैटर्न का पालन करते हैं, जबकि 81% OEMs में इस पैटर्न से महत्वपूर्ण विचलन पाया गया है।


लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तनों के प्रभाव

1. उत्पादन में देरी


2. लागत में वृद्धि


3. सप्लायर नेटवर्क पर नकारात्मक असर


4. गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर असर


5. सेवा और ग्राहक संतुष्टि में गिरावट


6. ब्रांड की छवि पर असर


7. बाजार हिस्सेदारी में गिरावट


8. आंतरिक टीमों पर मानसिक और कार्यभार का दबाव

  1. डिज़ाइन और टूलिंग में पुन कार्य हर परिवर्तन डिज़ाइन, टूलिंग, पुनः सत्यापन या सॉफ़्टवेयर अपडेट में पुनः कार्य को प्रेरित कर सकता है, जिससे लॉन्च शेड्यूल में देरी और लागत में वृद्धि होती है।

  2. सप्लायरों पर दबाव: लगभग 57% घटक निर्माता रिपोर्ट करते हैं कि बार-बार के लेट-स्टेज परिवर्तन उनके टीमों को निरंतर पुनः कार्य और संसाधनों के पुनः आवंटन में मजबूर करते हैं। इसका परिणामस्वरूप 76% को लंबी परियोजना लीड टाइम्स, 52% को समय पर डिलीवरी में कठिनाई, और 43% को लागत में वृद्धि का सामना करना पड़ता है।

  3. गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर प्रभाव: 33% OEMs ने वाहन के लॉन्च के बाद उत्पाद गुणवत्ता और विश्वसनीयता में चुनौतियों का सामना किया, जबकि 20% ने वारंटी लागत में वृद्धि और 58% ने सेवा और डीलर नेटवर्क लॉन्च की तत्परता में देरी की सूचना दी।


लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तनों के कारण

लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन अचानक नहीं होते। इनके पीछे कई तकनीकी, प्रक्रियागत और प्रबंधन से जुड़ी समस्याएँ होती हैं, जो उत्पाद के अंतिम चरण में बदलाव की मजबूरी पैदा करती हैं। नीचे इन कारणों को विस्तार से समझते हैं:


1. प्रारंभिक चरण में निर्माण इंजीनियरिंग इनपुट की कमी


2. सप्लायर प्रतिक्रिया में देरी


3. डिज़ाइन फ्रीज़ की अस्थिरता


4. नियम और सुरक्षा मानकों में बदलाव


5. ग्राहक प्रतिक्रिया और मार्केट ट्रेंड


6. परीक्षण के दौरान सामने आने वाली समस्याएँ


7. तकनीकी जटिलताएँ


8. लागत में कटौती की कोशिश

अध्ययन में तीन प्रमुख कारणों की पहचान की गई है:

  1. निर्माण इंजीनियरिंग इनपुट की कमी या देरी 60% उत्तरदाताओं ने बताया कि प्रारंभिक चरणों में निर्माण इंजीनियरिंग इनपुट की कमी या देरी के कारण समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

  2. सप्लायर प्रतिक्रिया में देरी: 47% ने बताया कि सप्लायर प्रतिक्रिया में देरी के कारण समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

  3. डिज़ाइन फ्रीज़ की अस्थिरता: 13% ने बताया कि डिज़ाइन फ्रीज़ की अस्थिरता के कारण समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

अध्ययन के अनुसार, यह चुनौती तकनीकी या दृष्टिकोण की कमी के कारण नहीं है, बल्कि निष्पादन में अंतराल के कारण है, जिसे नए उत्पाद विकास के तरीके में बदलाव करके सुधारा जा सकता है।


सुझाव और समाधान

वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप ने निम्नलिखित उपायों की सिफारिश की है:

  1. माइलस्टोन-आधारित ट्रैकिंग से फ्लो-आधारित निष्पादन मॉडल में परिवर्तन OEMs को माइलस्टोन-आधारित ट्रैकिंग से फ्लो-आधारित निष्पादन मॉडल में परिवर्तन करना चाहिए।

  2. प्रारंभिक चरण में सप्लायरों और अन्य हितधारकों की भागीदारी वाहन अवधारणा चरण में सप्लायरों और अन्य हितधारकों की प्रारंभिक भागीदारी से लेट-स्टेज परिवर्तनों की संख्या में 20-30% की कमी आ सकती है।

  3. “संरचित त्रैज” की स्थापना महत्वपूर्ण सुधारों को गैर-आवश्यक परिवर्तनों से अलग करने के लिए “संरचित त्रैज” की स्थापना से समय में 30-50% की कमी आ सकती है।

इन प्रथाओं को अपनाने से OEMs को अपने उत्पाद विकास चक्र को सुव्यवस्थित करने और वाहन लॉन्च में देरी को कम करने में मदद मिल सकती है। Business Standard

लेट-स्टेज इंजीनियरिंग परिवर्तन भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं। इन परिवर्तनों के कारण वाहन लॉन्च में देरी होती है, लागत में वृद्धि होती है, और गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है। हालांकि, यदि OEMs और सप्लायर मिलकर काम करें और वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप द्वारा सुझाए गए उपायों को अपनाएं, तो इन समस्याओं को हल किया जा सकता है। इससे न केवल वाहन लॉन्च में देरी कम होगी, बल्कि भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ेगी।

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