TVC India

क्यों अर्जुन युद्धभूमि में टूट गया? जानें श्रीकृष्ण काNO.1 दिव्य समाधान – सांख्ययोग का सार

श्रीकृष्ण का अर्जुन को युद्धभूमि पर दिया  उपदेश

अर्जुन

 

भूमिका

भारतीय दर्शन और आध्यात्मिकता का सर्वोच्च ग्रंथ भगवद्गीता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन के सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। गीता के विभिन्न अध्यायों में योग, ज्ञान, भक्ति और कर्म का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। गीता का दूसरा अध्याय “सांख्ययोग” कहलाता है, जिसे पूरी गीता का सार भी कहा जाता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता, जीवन का उद्देश्य और धर्म के मार्ग की महत्ता समझाई।

सांख्ययोग का अर्थ है – ज्ञान का योग, यानी वह योग जिसमें विवेक और तर्क के माध्यम से आत्मा और शरीर का भेद स्पष्ट किया जाता है। यह अध्याय युद्धभूमि में विचलित अर्जुन को आत्मविश्वास और धर्मपालन की शिक्षा देता है।


सांख्ययोग की पृष्ठभूमि

महाभारत के युद्ध के आरंभ में अर्जुन अपने ही संबंधियों और गुरुओं को युद्धभूमि में देखकर मोहग्रस्त और निराश हो जाता है। उसका मन युद्ध करने से पीछे हट जाता है और वह अपने गांडीव धनुष को धरती पर रखकर बैठ जाता है।
तभी श्रीकृष्ण उसे जीवन का वास्तविक ज्ञान कराते हैं और कहते हैं कि यह शरीर नश्वर है, परंतु आत्मा शाश्वत है। यही संवाद “सांख्ययोग” कहलाता है।


सांख्ययोग का अर्थ

‘सांख्य’ शब्द का अर्थ है – संख्या या विवेचन। यहाँ इसका मतलब है तर्कपूर्ण ज्ञान
सांख्ययोग में आत्मा और प्रकृति के स्वरूप का स्पष्ट विश्लेषण किया गया है। यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि:


सांख्ययोग के मुख्य उपदेश

1. आत्मा की अमरता

श्रीकृष्ण कहते हैं

“न जायते म्रियते वा कदाचि-न्नायं भूत्वा भविता वा न भूय।”
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। शरीर केवल एक वस्त्र की तरह है, जिसे आत्मा समय आने पर बदल देती है। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र पहनता है, वैसे ही आत्मा नया शरीर धारण करती है।


2. शरीर और आत्मा का भेद

सांख्ययोग में यह स्पष्ट किया गया कि शरीर भौतिक है और नाशवान है, जबकि आत्मा शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। यह समझ जीवन के दुखों और भय को मिटा देती है, क्योंकि मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं।


3. धर्म और कर्तव्य का पालन

कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना है। यदि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध न किया जाए तो अधर्म बढ़ेगा। व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, चाहे परिणाम कुछ भी हो।


4. समान भाव रखना

सांख्ययोग में समता का भाव महत्वपूर्ण है। सुख-दुख, लाभ-हानि, विजय-पराजय – इन सभी में मनुष्य को स्थिर रहना चाहिए। यही योग का सच्चा स्वरूप है।


5. कर्मयोग का परिचय

यद्यपि यह अध्याय सांख्ययोग कहलाता है, लेकिन इसमें कर्मयोग का भी बीजारोपण हुआ है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को केवल अपने कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
इस श्लोक के माध्यम से निष्काम कर्म का सिद्धांत स्थापित हुआ।


6. ज्ञान का महत्व

सांख्ययोग में ज्ञान को सर्वोच्च बताया गया है। जो व्यक्ति आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह भय, मोह और दुख से मुक्त हो जाता है।


सांख्ययोग के श्लोकों का सारांश

सांख्ययोग में कुल 47 श्लोक हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण श्लोकों का सार

  1. आत्मा अमर है – आत्मा को कोई अस्त्र भेद नहीं सकता, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है।

  2. कर्म करने का आदेश – अर्जुन को युद्ध करने का आदेश दिया गया क्योंकि यह उसका धर्म है।

  3. समत्वयोग – सुख-दुख में समान रहने की शिक्षा दी गई।

  4. निष्काम कर्म – फल की इच्छा छोड़कर कर्म करने का उपदेश।


सांख्ययोग का दार्शनिक महत्व

सांख्ययोग भारतीय दर्शन के सांख्य दर्शन से प्रेरित है, जिसमें आत्मा (पुरुष) और प्रकृति (प्रकृति) के भेद का विवेचन होता है।


आधुनिक जीवन में सांख्ययोग की प्रासंगिकता

सांख्ययोग केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि आज के युग के हर व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक है।


सांख्ययोग का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

सांख्ययोग मनोविज्ञान की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।


सांख्ययोग का आध्यात्मिक संदेश

सांख्ययोग का अंतिम उद्देश्य है – मोक्ष यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति। यह तभी संभव है जब हम आत्मा को जानें, शरीर से आसक्ति छोड़ें और अपने कर्म को ईश्वर को समर्पित

भगवद्गीता का दूसरा अध्याय “सांख्ययोग” केवल अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करने का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के हर पहलू को छूता है। इसमें आत्मा की शाश्वतता, धर्म पालन, निष्काम कर्म और समत्वभाव जैसे सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं।
आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धी युग में भी सांख्ययोग का संदेश हमें जीवन जीने की सही दिशा देता है। आत्मा और शरीर का भेद समझकर, बिना फल की चिंता किए कर्म करना ही सच्चे योगी का लक्षण है।
सांख्ययोग का अध्ययन हमें न केवल आध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति भी प्रदान करता है।

Next –

Exit mobile version