सीता हरण – Sita Haran

रामायण का एक अद्भुत, भावुक और निर्णायक प्रसंग – Sita Haran
वनवास का बारहवाँ वर्ष चल रहा था।
पंचवटी का वातावरण मानो किसी स्वप्नलोक जैसा था —
हल्की-हल्की हवा, आम्र वृक्षों की मीठी सुगंध, पक्षियों की चहचहाहट, और पास बहती गोदावरी नदी का मधुर कल-कल स्वर।
श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने यहाँ एक छोटी-सी कुटिया बनाई थी।
सुबह राम और लक्ष्मण धनुष-बाण लेकर वन में जाते, आश्रम की सुरक्षा करते, और शाम को सीता के साथ बैठकर दिनभर की बातें करते।
लेकिन इस शांत जीवन की परतों के नीचे, एक तूफान धीरे-धीरे आकार ले रहा था…
एक दिन, जब राम और लक्ष्मण शिकार के बाद लौट रहे थे, अचानक सामने एक असामान्य स्त्री प्रकट हुई।
उसकी आँखें लाल, नाक लंबी, दाँत नुकीले — यह थी शूर्पणखा, राक्षस राजा रावण की बहन।
उसने जैसे ही राम को देखा, उसकी निगाहें ठहर गईं।
“अरे, ऐसा रूप तो मैंने कभी देखा ही नहीं!” — उसने सोचा।
“राजकुमार, आप कौन हैं? और इस वन में क्या कर रहे हैं?” — शूर्पणखा ने मधुर स्वर में पूछा।
राम ने विनम्रता से उत्तर दिया —
“मैं अयोध्या का राजकुमार राम हूँ। ये मेरी पत्नी सीता और ये मेरे भाई लक्ष्मण हैं।”
शूर्पणखा तुरंत बोली —
“राम, सीता को छोड़ दीजिए और मुझसे विवाह कर लीजिए। मैं आपके लिए पूरे वन को स्वर्ग बना दूँगी।”
राम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा —
“मैं एक पत्नीव्रत हूँ, सीता ही मेरी जीवन संगिनी हैं।”
उसने हार न मानते हुए लक्ष्मण की ओर रुख किया —
“तो फिर लक्ष्मण, तुम मेरे साथ विवाह कर लो।”
लक्ष्मण हँस पड़े — “मैं तो अपने भाई की सेवा में ही जीवन बिताऊँगा।”
अपमान से भरी शूर्पणखा ने क्रोध में सीता की ओर झपटा, लेकिन लक्ष्मण ने तुरंत अपना खड्ग निकालकर उसकी नाक और कान काट दिए।
लहूलुहान होकर वह चीखती हुई अपने भाइयों के पास भागी।
शूर्पणखा सीधा लंका पहुँची और अपने भाई रावण से बोली —
“भैया, तुम्हारी बहन का अपमान हुआ है और एक मनुष्य ने किया है। लेकिन उससे भी बढ़कर, उसकी पत्नी सीता इतनी सुंदर है कि उसकी तुलना त्रिलोक में नहीं।”
रावण का अहंकार और इच्छा दोनों भड़क उठीं।
“सीता को मैं अपने महल में लाऊँगा, चाहे इसके लिए मुझे ब्रह्मांड से युद्ध क्यों न करना पड़े।”
रावण ने अपने मामा मारिच को बुलाया और योजना बनाई —
मारिच स्वर्ण मृग का रूप धारण करेगा और सीता को लुभाएगा, ताकि राम और लक्ष्मण कुटिया से दूर चले जाएँ, और फिर रावण सीता का हरण कर सके।
अगले दिन, सीता कुटिया के बाहर फूल चुन रही थीं।
अचानक उनकी नज़र दूर एक अद्भुत हिरण पर पड़ी — उसका शरीर सोने की तरह चमक रहा था, आँखों में माणिक की सी चमक, और उसकी गति किसी तारे के गिरने जैसी तेज़ थी।
“प्रभु! देखिए, कितना सुंदर हिरण है!” — सीता ने राम से कहा।
“यदि आप इसे पकड़ लाएँ, तो यह हमारे वनवास का एक प्यारा साथी होगा।”
राम ने शक करते हुए कहा —
“सीते, यह साधारण मृग नहीं है। वन में ऐसा स्वर्णिम जीव नहीं होता।”
लेकिन सीता की insistence के आगे उन्होंने हामी भर दी।
“लक्ष्मण, तुम सीता की रक्षा करना। मैं इसे पकड़कर लाता हूँ।” — यह कहकर राम हिरण के पीछे निकल पड़े।
काफी देर पीछा करने के बाद राम ने अपने बाण से मृग को मार दिया।
मरते समय मारिच ने राम की आवाज़ में चिल्लाया —
“हा लक्ष्मण! हा सीते!”
कुटिया में बैठी सीता ने यह आवाज़ सुनी और घबरा गईं।
“लक्ष्मण! प्रभु संकट में हैं, तुम तुरंत जाओ!”
लक्ष्मण ने समझाया —
“माँ, प्रभु अजेय हैं। यह ज़रूर कोई माया है।”
लेकिन सीता ने क्रोधित होकर कहा —
“यदि तुम्हें अपने भाई की चिंता नहीं, तो मैं अकेले ही खोजने निकल जाऊँगी!”
आहत होकर लक्ष्मण ने राम की रक्षा के मंत्रों से कुटिया को घेरा और स्वयं राम की खोज में निकल पड़े।
जैसे ही सीता अकेली हुईं, एक साधु के वेश में रावण कुटिया के द्वार पर आया।
“माँ, भिक्षा दीजिए।”
सीता ने तुरंत जल और फल लाकर दिया।
साधु ने धीमे स्वर में कहा —
“माता, आप जैसी रूपवती स्त्री इस वन में क्यों? मेरे साथ चलिए, मैं आपको लंका के महलों में रानी बनाकर रखूँगा।”
सीता ने कठोर स्वर में कहा —
“मैं श्रीराम की पत्नी हूँ। आपका यह प्रस्ताव अधर्म है।”
रावण का चेहरा विकराल हो गया।
“सीते! तुम मुझे मना नहीं कर सकतीं।”
और उसने अपने दस मुख और विशाल रूप में आकर सीता को बलपूर्वक पकड़ लिया।
रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बैठाया और लंका की ओर उड़ चला।
आकाश में उड़ते हुए उन्हें वृद्ध गिद्धराज जटायु दिखाई दिए।
“अरे अधर्मी! एक स्त्री का अपहरण करके जा रहा है? मुझसे पहले तुझे मरना होगा!”
जटायु ने रावण पर तीखे वार किए, उसके रथ को तोड़ा, और सीता को छुड़ाने की कोशिश की।
लेकिन रावण ने क्रोध में अपने तलवार से जटायु के पंख काट दिए।
गंभीर रूप से घायल जटायु भूमि पर गिर पड़े।
जब राम और लक्ष्मण लौटे, उन्होंने कुटिया को खाली पाया।
सीता का कहीं पता नहीं था।
जंगल के कोने-कोने में खोजते हुए वे जटायु के पास पहुँचे।
रक्त से लथपथ जटायु ने अंतिम सांसों में पूरी घटना सुनाई —
“राम, रावण सीता को दक्षिण दिशा में ले गया है… लंका…”
राम का हृदय पीड़ा और क्रोध से भर गया।
“रावण! चाहे मुझे सागर पार करना पड़े, पर्वत तोड़ना पड़े, या पूरी लंका जला देनी पड़े — मैं सीता को वापस लाऊँगा!”
जीवन की सीख
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लालच और मोह – स्वर्ण मृग के लोभ ने अनर्थ किया।
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सतर्कता का महत्व – थोड़ी-सी लापरवाही भारी पड़ सकती है।
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बलिदान और साहस – जटायु ने मृत्यु को गले लगाकर भी धर्म की रक्षा की।
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धर्म का पालन – चाहे जितनी कठिनाइयाँ आएँ, धर्म और सत्य की रक्षा करनी चाहिए।