इंदिरा एकादशी 2025 तिथि, महत्व, कथा और व्रत विधि की संपूर्ण जानकारी

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। वर्षभर में 24 एकादशियाँ आती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अलग नाम और महत्व होता है। इन्हीं में से एक है इंदिरा एकादशी, जो अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आती है। यह व्रत विशेष रूप से पितरों की शांति और मोक्ष के लिए किया जाता है।
साल 2025 में इंदिरा एकादशी 17 सितम्बर, बुधवार को मनाई जाएगी। यह तिथि पितृपक्ष के दौरान आती है और इसे पितरों की आत्मा की शांति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
1. इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त

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तारीख : बुधवार, 17 सितम्बर 2025
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एकादशी तिथि प्रारंभ : 16 सितम्बर, शाम 04:40 बजे
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एकादशी तिथि समाप्त : 17 सितम्बर, शाम 06:15 बजे
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पारण (व्रत खोलने का समय) : 18 सितम्बर को प्रातः 06:20 से 08:30 बजे तक
इस दिन व्रत रखने वाले भक्त प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और संध्या तक उपवास रखते हैं।
2. इंदिरा एकादशी का महत्व
इंदिरा एकादशी को “पितृमोक्ष एकादशी” भी कहा जाता है।
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इस दिन व्रत और पूजा करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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व्रतधारी को भी पापों से मुक्ति और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
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यह व्रत विशेषकर उन लोगों के लिए लाभकारी है जिनके पितरों की आत्मा अशांत मानी जाती है या जिनकी कुंडली में पितृदोष है।
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इंदिरा एकादशी व्रत का पालन करने से पितरों के साथ-साथ स्वयं के जीवन में भी सुख-समृद्धि आती है।
3. इंदिरा एकादशी की कथा (पौराणिक कहानी)
इंदिरा एकादशी की कथा
पौराणिक ग्रंथ ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार सतयुग में राजा इंद्रसेन नामक एक धर्मात्मा राजा शासन करते थे। वे अपने राज्य में धर्म, दया और न्याय के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन जब वे अपने दरबार में बैठे हुए थे, तभी ऋषि नारद जी वहाँ आए।
नारद जी ने राजा से कहा –
“हे राजन! आपके पिता यमलोक में अपने कर्मों के कारण दुख भोग रहे हैं। यदि आप उन्हें मुक्ति दिलाना चाहते हैं तो आने वाले पितृपक्ष में इंदिरा एकादशी व्रत करें और उस व्रत का फल अपने पितरों को अर्पित करें। ऐसा करने से आपके पिता को पापों से छुटकारा मिलेगा और उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।”
राजा इंद्रसेन ने ऋषि की आज्ञा का पालन किया। उन्होंने विधिपूर्वक व्रत किया और उसका फल अपने पिता को अर्पित किया। परिणामस्वरूप उनके पिता को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई और वे पितृशाप से मुक्त हो गए।
इस कथा से मिलने वाली सीख
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पितरों के तर्पण और व्रत का महत्व स्पष्ट होता है।
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जब संतान श्रद्धा से व्रत और दान करती है तो पितरों को शांति और मोक्ष मिलता है।
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इंदिरा एकादशी केवल व्यक्तिगत मुक्ति ही नहीं बल्कि कुल-मुक्ति का मार्ग भी है।
पद्म पुराण के अनुसार, त्रेतायुग में सत्यकेतु नामक राजा हुआ। उनके पिता का निधन हो गया और वे यमलोक चले गए। सत्यकेतु अपने पिता की आत्मा की मुक्ति के लिए चिंतित रहते थे।
उन्होंने महर्षि नारद से उपाय पूछा। नारद जी ने उन्हें इंदिरा एकादशी व्रत का पालन करने की सलाह दी। सत्यकेतु ने विधिपूर्वक इस व्रत का पालन किया और उसका फल अपने पितरों को अर्पित किया। परिणामस्वरूप उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिली और वे वैकुंठ धाम चले गए।
तभी से इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व और बढ़ गया।
4. इंदिरा एकादशी व्रत विधि
इंदिरा एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। इसकी विधि इस प्रकार है:
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प्रातःकाल स्नान और संकल्प – व्रतधारी सूर्योदय से पहले स्नान कर पवित्र वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
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पूजन स्थान की तैयारी – घर के मंदिर या पूजा स्थल को स्वच्छ करें और गंगाजल का छिड़काव करें।
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भगवान विष्णु की पूजा – पीले वस्त्र पहनाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
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व्रत की सामग्री – तुलसी पत्ते, पंचामृत, फूल, दीपक, धूप, फल और नैवेद्य तैयार करें।
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पूजा प्रक्रिया – दीप जलाकर श्री विष्णु के मंत्रों का जप करें और तुलसी दल अर्पित करें।
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पितरों का तर्पण – इस दिन पितरों के लिए जल तर्पण करना अनिवार्य माना गया है।
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भोजन नियम – व्रतधारी दिनभर फलाहार पर रहते हैं और रात को भजन-कीर्तन करके भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं।
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पारण – द्वादशी तिथि के दिन (अगले दिन) सूर्योदय के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
5. पितृपक्ष और इंदिरा एकादशी का संबंध
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पितृपक्ष को श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। यह वह समय होता है जब हम अपने पूर्वजों (पितरों) को याद करते हैं और तर्पण, पिंडदान तथा श्राद्ध के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। माना जाता है कि इस काल में पितरों की आत्माएँ पृथ्वी पर अपने वंशजों का आशीर्वाद देने आती हैं।
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पितृपक्ष के दौरान आने वाली इंदिरा एकादशी का विशेष महत्व है।
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यह एकादशी विशेष रूप से पितरों की मुक्ति के लिए मानी जाती है।
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इस दिन व्रत और उपवास करने से न केवल साधक को पुण्य मिलता है बल्कि उसके पितरों की आत्मा को भी स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।
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यदि किसी कारणवश परिवारजन पितृकर्म या श्राद्ध ठीक प्रकार से न कर पाए हों तो इंदिरा एकादशी का व्रत उस कमी को पूरा कर देता है।
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इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ-साथ पितरों का तर्पण और जल अर्पण अवश्य किया जाता है।
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ऐसा करने से परिवार पर से पितृदोष कम होता है और पितरों का आशीर्वाद मिलता है, जिससे जीवन में शांति और समृद्धि बनी रहती है।
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इंदिरा एकादशी हमेशा पितृपक्ष में आती है।
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इस समय पितरों का पृथ्वी पर आगमन होता है और वे अपने वंशजों से तर्पण और श्राद्ध की आशा रखते हैं।
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इस दिन व्रत और दान करने से पितरों की आत्मा संतुष्ट होती है।
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पितृदोष से मुक्ति पाने के लिए यह एकादशी विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।
6. व्रत के नियम
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व्रत से एक दिन पूर्व (दशमी तिथि)
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रात्रि को सात्विक भोजन करें।
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लहसुन, प्याज़, मांसाहार और नशे वाली वस्तुओं का सेवन न करें।
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मन, वाणी और आचरण को शुद्ध रखें।
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एकादशी के दिन
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प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें।
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पूरे दिन फलाहार या निर्जल उपवास करें (शक्ति अनुसार)।
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दिनभर विष्णु मंत्र और नामजप करते रहें।
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भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा चित्र को पीले वस्त्र, तुलसी दल और धूप-दीप से सजाकर पूजन करें।
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पितरों का तर्पण
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इस दिन पितरों के नाम से जल अर्पण, तिल अर्पण और दान करना विशेष फलदायी माना गया है।
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रात जागरण
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रात्रि में भजन-कीर्तन करें और यथासंभव जागरण करें।
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द्वादशी तिथि (अगले दिन)
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प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु का पूजन करें।
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ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।
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इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें।
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व्रतधारी को इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज़ और तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
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दिनभर ब्रह्मचर्य का पालन करें और क्रोध, लोभ व नकारात्मक भावनाओं से दूर रहें।
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संध्या समय तुलसी के पौधे की आरती करें।
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दान-पुण्य करें, जैसे – अन्न, वस्त्र, दक्षिणा और गौदान।
7. वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण
धार्मिक महत्व से इतर इंदिरा एकादशी का सामाजिक और वैज्ञानिक पक्ष भी है।
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यह व्रत पितृ ऋण को चुकाने का प्रतीक है।
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व्रत रखने से शरीर की पाचन प्रणाली को आराम मिलता है और स्वास्थ्य लाभ होता है।
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सामाजिक दृष्टि से यह दिन हमें पूर्वजों का सम्मान करना सिखाता है।
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यह त्याग, संयम और आत्मसंयम का अभ्यास है।
8. इंदिरा एकादशी के लाभ
इंदिरा एकादशी व्रत के आध्यात्मिक लाभ
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इस व्रत को करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं।
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इस व्रत का पालन करने वाले व्यक्ति को पापों से मुक्ति और पुण्य की प्राप्ति होती है।
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यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा पाने का सरल और प्रभावी उपाय माना गया है।
इंदिरा एकादशी के धार्मिक लाभ
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत करने से अश्रद्धालु या भूले हुए श्राद्ध कर्म की कमी पूरी हो जाती है।
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यह व्रत विशेष रूप से पितृपक्ष में किया जाता है, जिससे पितरों की कृपा बनी रहती है।
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इस व्रत से व्यक्ति के कुल में सुख-समृद्धि आती है और वंशज पितरों के आशीर्वाद से उन्नति करते हैं।
इंदिरा एकादशी के पारिवारिक लाभ
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घर में शांति और सौहार्द बढ़ता है।
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परिवार में धन-धान्य और समृद्धि आती है।
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पितरों की प्रसन्नता से आने वाली पीढ़ियों का जीवन भी सुगम होता है।
इंदिरा एकादशी के वैज्ञानिक और व्यावहारिक लाभ
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इस व्रत में फलाहार और उपवास से शरीर को हल्कापन और पाचन तंत्र को आराम मिलता है।
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मानसिक एकाग्रता और आत्मिक शांति बढ़ती है।
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उपवास और ध्यान से तनाव कम होता है और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
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पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति।
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व्रतधारी को पापों से मुक्ति और पुण्य फल।
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पितृदोष से मुक्ति मिलती है।
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परिवार में सुख-समृद्धि और शांति का आगमन होता है।
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धार्मिक दृष्टि से यह व्रत अमूल्य फलदायी माना गया है।
9. इंदिरा एकादशी से जुड़े विशेष मंत्र
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
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ॐ विष्णवे नमः
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विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
इंदिरा एकादशी 2025 केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर भी है। यह व्रत हमें अपने पितरों को स्मरण करने और उनके आशीर्वाद से जीवन को सुखमय बनाने का मार्ग दिखाता है।
इस दिन व्रत, पूजा, तर्पण और दान करके हम अपने जीवन को पवित्र बनाते हैं और पितरों की आत्मा को मोक्ष का मार्ग प्रदान करते हैं।
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