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नेपाल में ओली के इस्तीफे और हिंसा 5 तथ्य यहाँ से पढ़े पूरी जानकारी

नेपाल में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद संसद में हिंसा एक विस्तृत विश्लेषण

नेपाल में 9 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद देशभर में जो राजनीतिक उथल-पुथल मची, वह नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह घटनाक्रम न केवल नेपाल की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करता है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के समग्र राजनीतिक परिदृश्य पर भी गहरा असर डाल सकता है।


 घटनाक्रम का संक्षिप्त विवरण

9 सितंबर 2025 को नेपाली राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आया, जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा अचानक नहीं था, बल्कि महीनों की राजनीतिक तनावपूर्ण परिस्थितियों, युवाओं और विपक्षी दलों के विरोध, और सरकार की नीतियों के खिलाफ बढ़ते असंतोष का परिणाम था।

प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद नेपाल की राजधानी काठमांडू और अन्य प्रमुख शहरों में प्रदर्शन और हिंसा फैल गई। हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और उन्होंने सरकारी नीतियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, और प्रधानमंत्री निवास के पास कब्जा करने का प्रयास किया। कई जगह आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं।

इस हिंसा में कम से कम 19 लोग मारे गए और 340 से अधिक लोग घायल हुए। सड़कें बंद हो गईं, सार्वजनिक और निजी संपत्ति को गंभीर नुकसान पहुंचा, और त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा।

इस आंदोलन में जनरेशन Z, यानी युवा पीढ़ी, प्रमुख भूमिका में थी। सोशल मीडिया प्रतिबंध, बेरोजगारी, और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी नाराजगी ने उन्हें सड़कों पर उतार दिया। विरोध का स्वर इतना तेज था कि सरकार को सेना और पुलिस बलों को तैनात करना पड़ा, लेकिन स्थिति पूरी तरह से नियंत्रित नहीं हो सकी।

इस पूरे घटनाक्रम ने नेपाली राजनीति की अस्थिरता और सामाजिक असंतोष को पूरी दुनिया के सामने उजागर किया। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस पर चिंता जताई और शांति बनाए रखने के लिए संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया।

प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने 9 सितंबर 2025 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद संसद भवन में आगजनी की घटनाएं हुईं, जिसमें कई सरकारी भवनों को भी नुकसान पहुंचा। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री के निवास और राष्ट्रपति के आवास पर भी हमले किए। इस हिंसा में कम से कम 19 लोगों की मौत हुई और 340 से अधिक लोग घायल हुए। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार और सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की। यह आंदोलन मुख्य रूप से युवा वर्ग द्वारा चलाया गया, जिसे “जनरेशन Z” के नाम से जाना जाता है।


 प्रधानमंत्री के इस्तीफे के कारण

1. सोशल मीडिया पर प्रतिबंध

सरकार ने सितंबर 2025 में 26 प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाया, जिसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और व्हाट्सएप शामिल थे। सरकार ने इस कदम को साइबर अपराध, नफरत भरी भाषाओं और गलत सूचनाओं को रोकने के लिए उठाया।
हालांकि, युवाओं के बीच यह कदम बहुत ही अस्वीकृति का कारण बना। सोशल मीडिया युवाओं के लिए केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक सक्रियता का साधन भी है। इस प्रतिबंध ने उनके अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए, जिससे व्यापक नाराजगी पैदा हुई।

2. भ्रष्टाचार और राजनीतिक असंतोष

नेपाल में लंबे समय से सरकारी भ्रष्टाचार की शिकायतें रही हैं। प्रधानमंत्री ओली की सरकार पर यह आरोप लगाया गया कि कई बड़े परियोजनाओं और सरकारी सौदों में अविश्वसनीय पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी रही।
युवाओं और नागरिकों ने महसूस किया कि सरकार की नीतियाँ केवल राजनीतिक दलों और कुछ खास लोगों के हित में हैं, जबकि आम जनता की समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।

3. बेरोजगारी और आर्थिक असमानता

नेपाल में बेरोजगारी की दर लगभग 20% है। युवाओं में रोजगार के अवसर सीमित हैं और उनकी उम्मीदें लगातार निराशा में बदल रही हैं। सरकार की नीतियाँ युवाओं की आकांक्षाओं और रोज़गार सृजन की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पा रही थीं। इस आर्थिक असमानता और निराशा ने राजनीतिक असंतोष को और बढ़ावा दिया।


 संसद में हिंसा और उसके परिणाम

प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद, प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन में आग लगा दी और कई सरकारी भवनों को नुकसान पहुंचाया। काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भी बंद करना पड़ा, जिसके कारण कई उड़ानों को अन्य शहरों में डायवर्ट किया गया। नेपाली सेना ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन हिंसा की घटनाएं जारी हैं।


 अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

1. भारत की प्रतिक्रिया

नेपाल का सबसे करीबी पड़ोसी और रणनीतिक सहयोगी भारत ने नेपाल में हो रही हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की। भारत ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान करने की अपील की।
भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि “हम नेपाल की जनता और सरकार से अनुरोध करते हैं कि वे शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से राजनीतिक समस्याओं का समाधान करें। हिंसा और तोड़फोड़ किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए स्वीकार्य नहीं है।”

2. संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संस्थाएँ

संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने नेपाल में हुई हिंसा पर गहरा खेद जताया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का पालन करने के लिए सरकार और नागरिकों को संवाद और सहमति के मार्ग को अपनाना चाहिए।
इसके अलावा, कई मानवाधिकार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार निगरानी संगठन (HRW) ने कहा कि युवा प्रदर्शनकारियों और नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए।

3. पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया

4. सामाजिक मीडिया और वैश्विक ध्यान

नेपाल में युवा प्रदर्शनकारियों के आंदोलनों ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जिन्हें नेपाल सरकार ने प्रतिबंधित किया था, पर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस स्थिति को लेकर चिंता जताई। कई देशों के युवा और नागरिक संगठन नेपाल में लोकतंत्र और मानवाधिकार की रक्षा के लिए आवाज उठाने लगे।

5. कूटनीतिक दबाव और भविष्य की संभावनाएँ

इस घटनाक्रम ने नेपाल पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव भी बढ़ा दिया। पड़ोसी देशों और वैश्विक शक्तियों ने नेपाल की सरकार से आग्रह किया कि वे संवैधानिक ढांचे के भीतर समाधान खोजें, ताकि देश में स्थिरता बनी रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और देश के अंदर बढ़ते युवा आंदोलन ने प्रधानमंत्री ओली के इस्तीफे को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।

भारत और अन्य पश्चिमी देशों ने नेपाल में हो रही हिंसा की निंदा की है और शांति की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने भी हिंसा पर चिंता व्यक्त की है और राजनीतिक संवाद की आवश्यकता बताई है।


भविष्य की दिशा

नेपाल में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे और उसके बाद हुई हिंसा ने देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर गहरा असर डाला है। भविष्य में नेपाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा।

1. राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव

प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद नेपाल में अस्थिरता का दौर जारी है। विपक्षी दलों और युवा आंदोलन के दबाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार केवल शीर्ष नेतृत्व के फैसलों से नहीं चल सकती। भविष्य में, राजनीतिक दलों को सामूहिक निर्णय और समावेशी नीति अपनानी होगी, ताकि जनता का विश्वास बहाल हो सके।

2. युवाओं और जनरेशन Z की भूमिका

नेपाल में युवा वर्ग, विशेष रूप से जनरेशन Z, अब राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का एक निर्णायक कारक बन गया है। उनके अधिकारों, रोजगार की मांगों और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूकता के कारण, आने वाले समय में सरकार को युवाओं के हितों और आकांक्षाओं पर ध्यान देना पड़ेगा।
युवा आंदोलन ने यह दिखाया कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भविष्य में सरकार को युवाओं के साथ संवाद स्थापित करना अनिवार्य होगा।

3. संवैधानिक सुधार और लोकतांत्रिक ढांचा

विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल को संवैधानिक सुधार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने की आवश्यकता है। संसद और राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक समाधान, जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले कानूनों को लागू करना होगा।
यह कदम केवल अस्थिरता को कम करने के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अन्य राजनीतिक संघर्षों को नियंत्रित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर जारी है। नेपाली सेना ने राजनीतिक संवाद की आवश्यकता जताई है। भविष्य में, नेपाल को एक स्थिर और समावेशी सरकार की आवश्यकता है, जो भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और युवाओं के लिए रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित करे

नेपाल में प्रधानमंत्री के इस्तीफे और संसद में हुई हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता में सरकार के प्रति असंतोष गहरा चुका है। यह घटनाक्रम नेपाल के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक चुनौती है, लेकिन साथ ही यह सुधार की दिशा में एक अवसर भी प्रदान करता है। आने वाले समय में, नेपाल को एक स्थिर और समावेशी सरकार की आवश्यकता होगी, जो जनता की आकांक्षाओं को समझे और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाए।

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