पाकिस्तान-सऊदी अरब की रक्षा संधि —पूरी जानकारी

19 सितंबर 2025 को पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक ऐतिहासिक रक्षा संधि (Defence Pact) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को “Strategic Mutual Defence Agreement” कहा गया है, जिसमें साफ शब्दों में कहा गया है कि यदि किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह संधि न केवल दक्षिण एशिया बल्कि पूरे मध्य-पूर्व और इस्लामी देशों की राजनीति में नए समीकरण पैदा करने वाली है।
सऊदी अरब और पाकिस्तान दशकों से धार्मिक, आर्थिक और सामरिक रिश्तों से जुड़े रहे हैं, लेकिन इस तरह की स्पष्ट “साझा रक्षा गारंटी” पहली बार सामने आई है। इसलिए यह समझौता अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बेहद अहम है।
संधि की पृष्ठभूमि
सऊदी अरब और पाकिस्तान के रिश्तों की गहरी जड़ें कई दशकों से हैं।
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धार्मिक संबंध – सऊदी अरब इस्लाम का केंद्र है और पाकिस्तान खुद को इस्लामी दुनिया का अहम देश मानता है।
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आर्थिक रिश्ता – लाखों पाकिस्तानी नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं और बड़ी मात्रा में रेमिटेंस पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सहारा देती है।
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सैन्य सहयोग – पाकिस्तानी सेना ने लंबे समय से सऊदी अरब में ट्रेनिंग और सुरक्षा प्रदान की है। कई बार पाकिस्तानी जवान मक्का-मदीना की सुरक्षा के लिए भी तैनात रहे हैं।
हालाँकि, हाल के वर्षों में भारत-सऊदी रिश्ते भी मजबूत हुए थे। भारत और सऊदी अरब ऊर्जा, निवेश और सुरक्षा सहयोग में आगे बढ़ रहे थे। ऐसे समय में यह रक्षा संधि भारत के लिए एक नई चुनौती की तरह सामने आई है।
संधि के मुख्य बिंदु
हालाँकि समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं की गई हैं, लेकिन मीडिया और आधिकारिक बयानों से जो बातें सामने आई हैं, वे इस प्रकार हैं:
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साझा रक्षा गारंटी – किसी एक पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा।
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आतंकवाद के खिलाफ सहयोग – दोनों देश आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ मिलकर काम करेंगे।
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सैन्य प्रशिक्षण और तकनीक – पाकिस्तानी सेना सऊदी सेना को प्रशिक्षण देगी और सऊदी अरब आधुनिक हथियारों और तकनीक से पाकिस्तान की मदद करेगा।
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आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा – रक्षा सहयोग के साथ-साथ ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रिश्तों को भी सुरक्षित किया जाएगा।
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क्षेत्रीय सुरक्षा में भूमिका – मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए दोनों देश साझा रणनीति बनाएंगे।
पाकिस्तान के लिए महत्व
पाकिस्तान के लिए यह समझौता कई मायनों में ऐतिहासिक है:
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आर्थिक सहारा – पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। सऊदी अरब से मिलने वाली आर्थिक मदद और तेल आपूर्ति उसके लिए जीवनदायिनी है।
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सैन्य समर्थन – पाकिस्तान को लगता है कि भारत के खिलाफ उसे एक मजबूत सामरिक सहयोगी मिल गया है।
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कूटनीतिक जीत – पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह दिखा सकता है कि इस्लामी दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश उसके साथ खड़ा है।
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आंतरिक राजनीति में लाभ – पाकिस्तान की सरकार इसे घरेलू राजनीति में अपनी बड़ी सफलता के रूप में पेश करेगी।
सऊदी अरब के लिए महत्व
सऊदी अरब की प्राथमिकताएँ भी इस संधि से साफ होती हैं:
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क्षेत्रीय शक्ति संतुलन – ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सऊदी अरब पाकिस्तान को अपने साथ जोड़ रहा है।
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सैन्य ताकत – पाकिस्तानी सेना के अनुभव और कुशलता से सऊदी अपनी सैन्य सुरक्षा को और मजबूत करेगा।
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इस्लामी दुनिया में नेतृत्व – सऊदी खुद को इस्लामी देशों का नेता मानता है, और पाकिस्तान के साथ गठबंधन से उसका नेतृत्व और मजबूत होगा।
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एशिया में प्रभाव – भारत और चीन दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए सऊदी अरब अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
भारत पर असर
भारत इस समझौते को गहरी नजरों से देख रहा है।
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रणनीतिक चिंता – पाकिस्तान को सऊदी अरब जैसा मजबूत सहयोगी मिलने का मतलब है कि भारत को अपने पश्चिमी मोर्चे पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
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ऊर्जा आपूर्ति – भारत सऊदी तेल का बड़ा खरीदार है। यदि रिश्तों में तनाव आता है तो ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
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कूटनीतिक संतुलन – भारत और सऊदी के रिश्ते पिछले कुछ सालों में काफी बेहतर हुए थे। यह समझौता उस पर असर डाल सकता है।
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आतंकवाद और सुरक्षा – भारत को डर है कि कहीं यह सहयोग पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों को अप्रत्यक्ष मदद न पहुँचा दे।
राजनीति पर असर
1. अमेरिका की रणनीति पर असर
अमेरिका लंबे समय से सऊदी अरब का सुरक्षा साझेदार रहा है। लेकिन अगर सऊदी पाकिस्तान के साथ गहराई से जुड़ता है, तो अमेरिका इसे संतुलन बिगाड़ने वाला कदम मान सकता है। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान पर आतंकवाद से जुड़े आरोपों को लेकर कड़ा रुख अपनाता रहा है। ऐसे में यह समझौता वाशिंगटन और रियाद के बीच तनाव पैदा कर सकता है।
2. चीन की भूमिका
चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा सामरिक और आर्थिक सहयोगी है। साथ ही, सऊदी अरब के साथ उसके ऊर्जा और निवेश संबंध भी गहरे हैं। यह संधि चीन के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है क्योंकि वह इन दोनों देशों के बीच “कड़ी” बनकर उभरेगा। इसका असर भारत-अमेरिका गठबंधन पर भी पड़ेगा।
3. ईरान के साथ प्रतिस्पर्धा
ईरान और सऊदी अरब ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी हैं। पाकिस्तान-सऊदी गठबंधन ईरान को और सतर्क कर देगा। यह संभावना है कि ईरान अपने रिश्ते तुर्की, रूस या चीन के साथ और मजबूत करे ताकि इस नए गठबंधन का संतुलन बनाया जा सके। इससे मध्य-पूर्व में नई ध्रुवीय राजनीति (polarisation) पैदा होगी।
4. इस्लामी देशों की राजनीति
सऊदी अरब खुद को इस्लामी दुनिया का नेता मानता है। पाकिस्तान पहले से ही OIC (Organisation of Islamic Cooperation) में भारत विरोधी आवाज़ उठाता रहा है। अब इस संधि के बाद OIC मंच पर पाकिस्तान और सऊदी की आवाज़ और मजबूत होगी, जिससे भारत को वहां चुनौती मिल सकती है।
5. रूस और यूरोप की प्रतिक्रिया
रूस फिलहाल पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह संधि उसे सावधान करेगी क्योंकि रूस भी ईरान और सऊदी दोनों के साथ संबंध रखता है। वहीं यूरोप सऊदी अरब से तेल और ऊर्जा पर निर्भर है, इसलिए वह इस समझौते से पैदा होने वाले तनाव पर बारीकी से नज़र रखेगा।
6. वैश्विक शक्ति संतुलन
यह संधि एशिया और मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन को बदल सकती है। एक तरफ भारत-अमेरिका-यूरोप का सहयोग है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान-सऊदी-चीन की धुरी उभरती दिख रही है। इससे “नई शीत युद्ध जैसी स्थिति” बनने की आशंका जताई जा रही है।
यह समझौता केवल भारत-पाक या सऊदी-ईरान के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति पर असर डाल सकता है।
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अमेरिका – अमेरिका पारंपरिक रूप से सऊदी का करीबी रहा है, लेकिन अब उसकी प्राथमिकताएँ बदल रही हैं।
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चीन – चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा सहयोगी है और सऊदी अरब से उसके व्यापारिक संबंध भी मजबूत हैं। यह तिकड़ी नए समीकरण बना सकती है।
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ईरान – ईरान के लिए यह गठबंधन सीधी चुनौती है, क्योंकि वह खुद भी क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की कोशिश कर रहा है।
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इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) – यह समझौता OIC की राजनीति पर भी असर डालेगा, क्योंकि पाकिस्तान और सऊदी दोनों इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।
चुनौतियाँ और विवाद
1. भारत-सऊदी संबंधों पर असर
सऊदी अरब और भारत के बीच हाल के वर्षों में ऊर्जा, निवेश और सुरक्षा सहयोग गहराया है। अगर सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ अत्यधिक नज़दीकी दिखाता है, तो भारत-सऊदी रिश्तों में दरार आ सकती है। यह सऊदी अरब के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी क्योंकि भारत उसके लिए ऊर्जा और व्यापार का विशाल बाज़ार है।
2. पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरी
पाकिस्तान गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। IMF और अन्य देशों की मदद पर निर्भर रहना उसकी स्थिरता पर सवाल खड़े करता है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए यह जोखिम भरा है कि वह पाकिस्तान को एक विश्वसनीय सैन्य सहयोगी माने।
3. अंतर्राष्ट्रीय दबाव
अमेरिका और यूरोप दोनों ही सऊदी अरब के करीबी साझेदार रहे हैं। वे इस समझौते को दक्षिण एशिया में अस्थिरता बढ़ाने वाला मान सकते हैं। अगर पश्चिमी दबाव बढ़ा, तो सऊदी अरब को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
4. ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से टकराव रहा है। पाकिस्तान भी कई मौकों पर ईरान के खिलाफ सऊदी का साथ देता रहा है। यह संधि ईरान को उत्तेजित कर सकती है, जिससे खाड़ी क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।
5. आतंकी संगठनों की गतिविधियाँ
भारत और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह डर है कि कहीं यह रक्षा संधि अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों के लिए मददगार न बन जाए। अगर ऐसा होता है, तो यह विवाद और भी गहरा जाएगा।
6. आंतरिक राजनीति में विवाद
पाकिस्तान में विपक्षी दल इस संधि को सरकार की “कूटनीतिक उपलब्धि” मानने के बजाय इसे “आर्थिक भीख के बदले सुरक्षा बेचने” जैसा बता सकते हैं। वहीं सऊदी अरब में भी कुछ गुट मान सकते हैं कि पाकिस्तान पर ज़्यादा भरोसा करना उचित नहीं है।
हालाँकि यह समझौता बड़ा दिखता है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियाँ भी हैं:
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सऊदी-भारत संबंध – सऊदी अरब भारत से आर्थिक रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहेगा।
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पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरी – पाकिस्तान पर इतना भरोसा करना सऊदी के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
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अंतर्राष्ट्रीय दबाव – अमेरिका और यूरोप इस तरह की संधि को संदेह की नज़र से देख सकते हैं।
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ईरान की प्रतिक्रिया – ईरान इस पर कैसे प्रतिक्रिया देगा, यह भी एक बड़ी चुनौती होगी।
भविष्य की संभावनाएँ
आने वाले समय में यह संधि कई तरह से असर डाल सकती है:
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पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य मजबूती मिल सकती है।
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सऊदी अरब अपनी सुरक्षा को लेकर और आत्मविश्वासी होगा।
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भारत को अपनी कूटनीति और रक्षा रणनीति को और संतुलित करना होगा।
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ईरान और तुर्की जैसे देश भी नए गठबंधन बना सकते हैं।
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एशिया और मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन एक नए मोड़ पर पहुँच सकता है।
पाकिस्तान-सऊदी अरब की रक्षा संधि केवल दो देशों का समझौता नहीं है, बल्कि यह पूरे एशिया और इस्लामी दुनिया की राजनीति को प्रभावित करने वाला कदम है। पाकिस्तान के लिए यह जीवनदायिनी सहारा है, जबकि सऊदी अरब के लिए यह क्षेत्रीय वर्चस्व को मजबूत करने का साधन।
भारत के लिए यह समझौता चिंता का विषय है, लेकिन यह भी सच है कि सऊदी अरब भारत के आर्थिक महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। इसलिए आने वाले वर्षों में यह देखा जाएगा कि यह समझौता केवल प्रतीकात्मक रहता है या वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को गहराई से प्रभावित करता है।
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