भगवद गीता का पन्द्रहवां अध्याय – पुरुषोत्तम योग की पूरी जानकारी
भगवद गीता, भारतीय दर्शन का अमूल्य रत्न है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, जिनमें जीवन, कर्म, भक्ति, ज्ञान और मोक्ष के गहन रहस्य स्पष्ट किए गए हैं। गीता का पन्द्रहवां अध्याय “पुरुषोत्तम योग” कहलाता है। यह अध्याय संक्षिप्त है (20 श्लोक) लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने संसार की वास्तविकता, जीवात्मा और परमात्मा का संबंध तथा “पुरुषोत्तम” की संकल्पना स्पष्ट की है।
इस अध्याय में संसार को एक उल्टे पीपल के वृक्ष (अश्वत्थ वृक्ष) से तुलना करके उसकी अनित्य (अस्थायी) प्रकृति बताई गई है। साथ ही, जीवात्मा को बंधन और मुक्ति के कारणों के साथ परम पुरुषोत्तम की महिमा का बखान किया गया है।
अध्याय का नाम और महत्व

भगवद गीता का पन्द्रहवां अध्याय “पुरुषोत्तम योग” कहलाता है। यह नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—
-
पुरुष: जिसका अर्थ है जीवात्मा (व्यक्ति) और परमात्मा।
-
उत्तम: जिसका अर्थ है सर्वोच्च या श्रेष्ठ।
-
योग: जिसका अर्थ है मिलन या जुड़ाव।
इस प्रकार, पुरुषोत्तम योग का अर्थ है – जीवात्मा और परमात्मा के बीच सर्वोच्च संबंध की व्याख्या करने वाला योग।
अध्याय का महत्व
-
संसार का वास्तविक स्वरूप
इस अध्याय में संसार को एक “उल्टे अश्वत्थ वृक्ष” के रूप में वर्णित किया गया है, जिससे हमें जीवन की अस्थायीता और मोह-माया का बोध होता है। -
जीवात्मा और परमात्मा का संबंध
भगवान बताते हैं कि जीवात्मा उनका सनातन अंश है। आत्मा न जन्म लेती है न मरती है, बल्कि केवल शरीर बदलती रहती है। -
पुरुषोत्तम की संकल्पना
इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को “पुरुषोत्तम” कहा है — जो क्षर (नश्वर प्राणी) और अक्षर (अविनाशी आत्मा) दोनों से परे हैं और जो संपूर्ण सृष्टि का नियंता है। -
वेदों का सार
भगवान ने कहा कि वे ही वेदों के ज्ञाता हैं और वेदांत के कर्ता हैं। इसका अर्थ है कि समस्त वेदज्ञान का निष्कर्ष पुरुषोत्तम की भक्ति है। -
संक्षिप्त लेकिन गहन अध्याय
केवल 20 श्लोकों में यह अध्याय गीता के गूढ़ दार्शनिक सार को प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि इसे गीता के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में गिना जाता है।
अध्याय का सारांश
1. संसार का स्वरूप – अश्वत्थ वृक्ष (श्लोक 1-4)
भगवान श्रीकृष्ण संसार को एक उल्टे पीपल के वृक्ष से तुलना करते हैं।
-
जड़ ऊपर (ब्रह्म या परमात्मा से जुड़ी) है।
-
शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं (विविध लोक और कर्म के रूप में)।
-
पत्ते वेद हैं, जो जीवन को पोषण देते हैं।
यह वृक्ष अनादि है, और इसमें मनुष्य मोह में बंधा रहता है। लेकिन जब ज्ञानी व्यक्ति इस वृक्ष की गहराई को समझकर “वैराग्य” के तलवार से इसे काटता है, तभी वह परम सत्य तक पहुँच सकता है।
संदेश: संसार मोह और बंधनों का पेड़ है, जिसे केवल ज्ञान और वैराग्य से काटा जा सकता है।
2. जीवात्मा का स्वरूप (श्लोक 5-11)
भगवान बताते हैं कि जीवात्मा परमात्मा का अंश है।
-
यह देह में रहते हुए भी अमर और शाश्वत है।
-
जीवात्मा कर्म के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में बंधा है।
-
जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, वैसे ही आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है।
संदेश: आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह केवल शरीर बदलती है।
3. परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12-15)
यहाँ भगवान कहते हैं कि—
-
मैं ही सूर्य की रोशनी हूँ, जो अंधकार को दूर करती है।
-
मैं ही पृथ्वी की उर्वरता, चंद्रमा का रस और अग्नि का तेज हूँ।
-
मनुष्य के हृदय में स्थित होकर मैं ही उसकी स्मृति, ज्ञान और विस्मृति का कारण हूँ।
-
मैं ही वेदों का ज्ञाता और वेदांत का कर्ता हूँ।
संदेश: समस्त विश्व में व्याप्त शक्ति परमात्मा ही है।
4. पुरुषोत्तम का स्वरूप (श्लोक 16-20)
यहाँ भगवान ने तीन प्रकार के “पुरुष” बताए हैं:
-
क्षर पुरुष – नश्वर जीव, जो जन्म-मरण में बंधा है।
-
अक्षर पुरुष – अविनाशी आत्मा, जो नष्ट नहीं होती।
-
पुरुषोत्तम – परमात्मा (भगवान), जो इन दोनों से परे हैं और इनका नियंता है।
यही पुरुषोत्तम (श्रीकृष्ण) समस्त जगत का पालनकर्ता और उद्धारकर्ता है।
संदेश: केवल पुरुषोत्तम को जानने से ही मनुष्य परम शांति और मुक्ति पा सकता है।
दार्शनिक महत्व
-
अश्वत्थ वृक्ष का रूपक: यह जीवन की अनित्यता और मोह-माया के चक्र को दर्शाता है।
-
जीवात्मा और परमात्मा का संबंध: जीव आत्मा परमात्मा का अंश है, लेकिन जब तक वह अज्ञान और आसक्ति में रहता है, तब तक बंधन में फँसा रहता है।
-
पुरुषोत्तम का ज्ञान: भगवान स्वयं को पुरुषोत्तम घोषित करते हैं, जिससे यह अध्याय गीता के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक अध्यायों में आता है।
-
भक्ति और समर्पण: ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का संगम ही मुक्ति का मार्ग है।
जीवन के लिए शिक्षा
1. मोह-माया से ऊपर उठना
संसार एक अश्वत्थ वृक्ष की तरह है, जिसकी शाखाएँ फैली रहती हैं और मनुष्य उनमें उलझा रहता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि मोह-माया में फँसकर हम जीवन का असली उद्देश्य भूल जाते हैं। जब हम वैराग्य अपनाते हैं, तभी सच्चा संतुलन और शांति मिलती है।
2. आत्मा की अमरता को समझना
भगवान कहते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यह शरीर बदलती रहती है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। यह शिक्षा हमें मृत्यु के भय से मुक्त करती है और जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है।
3. परमात्मा ही जीवन का आधार है
मनुष्य की बुद्धि, स्मृति, शक्ति और हर क्रिया-प्रतिक्रिया का आधार परमात्मा है। जब हम यह समझते हैं कि जीवन की असली शक्ति भीतर से आती है, तो हम अहंकार छोड़कर विनम्र और कृतज्ञ बनते हैं।
4. पुरुषोत्तम की शरण का महत्व
जीवन में कितनी भी उपलब्धियाँ क्यों न हों, अंतिम शांति केवल तब मिलती है जब हम परम पुरुषोत्तम (भगवान) की शरण में जाते हैं। यही भक्ति और समर्पण का मार्ग है, जो हमें दुख-सुख से परे ले जाकर मुक्ति प्रदान करता है।
5. संतुलन और विवेक
पुरुषोत्तम योग हमें सिखाता है कि ज्ञान (बुद्धि), वैराग्य (अनासक्ति) और भक्ति (समर्पण) तीनों का संतुलन जीवन में आवश्यक है। केवल भक्ति या केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जीवन में विवेक का उपयोग करना ही वास्तविक योग है।
-
मोह-माया से मुक्ति: संसार के सुख-दुख अस्थायी हैं, अतः इनसे ऊपर उठकर आत्मज्ञान पर ध्यान देना चाहिए।
-
आत्मा अमर है: जीवन और मृत्यु केवल शरीर तक सीमित हैं, आत्मा कभी नष्ट नहीं होती।
-
परमात्मा ही आधार है: मनुष्य की स्मृति, बुद्धि और शक्ति सब परमात्मा से ही आती है।
-
पुरुषोत्तम की शरण: जब मनुष्य भगवान को पुरुषोत्तम के रूप में स्वीकार कर उनकी शरण में जाता है, तभी सच्ची शांति और मुक्ति मिलती है।
-
वैराग्य का महत्व: केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि वैराग्य (मोह से दूरी) भी आवश्यक है।
आधुनिक संदर्भ में पुरुषोत्तम योग
भगवद गीता का पन्द्रहवां अध्याय “पुरुषोत्तम योग” सिर्फ़ दार्शनिक या धार्मिक ग्रंथ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक जीवन की जटिलताओं में भी मार्गदर्शन देता है। आज के दौर में, जहाँ भौतिकता और तकनीकी प्रगति तेज़ी से बढ़ रही है, वहीं मानसिक तनाव, असंतुलन और जीवन के असली उद्देश्य से भटकाव भी बढ़ा है। ऐसे समय में पुरुषोत्तम योग की शिक्षा हमें संतुलन, शांति और स्पष्टता प्रदान करती है।
1. भौतिकता और मोह-माया से मुक्ति
आज लोग धन, पद और भौतिक सुख-सुविधाओं को ही सफलता मानते हैं। लेकिन पुरुषोत्तम योग हमें याद दिलाता है कि संसार का “अश्वत्थ वृक्ष” अस्थायी है। यह समझ हमें अनावश्यक प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और मोह-माया से मुक्त कर सकती है।
2. तनाव और मानसिक अस्थिरता का समाधान
वर्तमान जीवन में तनाव (Stress) और अवसाद (Depression) आम हो गए हैं। पुरुषोत्तम योग कहता है कि आत्मा शाश्वत है और शरीर अस्थायी। जब व्यक्ति आत्मा की अमरता को समझता है तो वह छोटी-छोटी परेशानियों से ऊपर उठकर मानसिक शांति प्राप्त करता है।
3. पर्यावरण और प्रकृति का महत्व
भगवान ने इस अध्याय में स्वयं को सूर्य, चंद्रमा, जल और अग्नि से जोड़ा है। आधुनिक दौर में जब पर्यावरण संकट गहरा रहा है, यह संदेश हमें प्रकृति को पूजनीय मानने और उसके संरक्षण की ओर प्रेरित करता है।
4. तकनीकी युग में आत्मिक संतुलन
आज इंसान तकनीकी रूप से उन्नत हो रहा है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से खालीपन महसूस करता है। पुरुषोत्तम योग हमें सिखाता है कि वास्तविक प्रगति केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मिक संतुलन और भगवान से जुड़ाव में है।
5. वैश्विक भाईचारा और शांति
पुरुषोत्तम योग का पुरुषोत्तम सिद्धांत बताता है कि सभी आत्माएँ परमात्मा के अंश हैं। जब यह भाव हमारे मन में बैठता है, तो जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के भेदभाव मिट जाते हैं और मानवता का भाव विकसित होता है। यही आधुनिक विश्व के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आज के दौर में, जहाँ भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ गई हैं लेकिन मानसिक शांति कम होती जा रही है, पुरुषोत्तम योग का महत्व और भी बढ़ जाता है।
-
तनाव और प्रतिस्पर्धा: जब हम समझते हैं कि यह संसार अस्थायी है, तो अनावश्यक लालसा और ईर्ष्या से मुक्ति मिल सकती है।
-
पर्यावरण और प्रकृति: भगवान ने स्वयं को सूर्य, चंद्रमा, जल और अग्नि से जोड़ा है। इससे हमें प्रकृति को सम्मान देने और उसकी रक्षा करने की प्रेरणा मिलती है।
-
आध्यात्मिक संतुलन: केवल भौतिक उपलब्धियाँ ही जीवन का लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि आत्मिक शांति और भगवान की शरण ही वास्तविक उपलब्धि है।
महत्वपूर्ण श्लोक और उनका सार
-
अश्वत्थ वृक्ष रूपक
“ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्…”
→ संसार एक उल्टा वृक्ष है, जिसकी जड़ें परमात्मा से जुड़ी हैं। -
जीवात्मा का स्वरूप
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः…”
→ जीवात्मा सनातन है और परमात्मा का अंश है। -
पुरुषोत्तम का ज्ञान
“उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः…”
→ परमात्मा ही पुरुषोत्तम है, जो क्षर और अक्षर दोनों से परे है।
भगवद गीता का पन्द्रहवां अध्याय “पुरुषोत्तम योग” जीवन के परम सत्य को सरल रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि संसार अस्थायी है और आत्मा शाश्वत। केवल परम पुरुषोत्तम (भगवान) की शरण में जाकर ही मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि मोह-माया में उलझे बिना ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के मार्ग पर चलना ही सच्चे जीवन का उद्देश्य है। आज की व्यस्त और भौतिकवादी दुनिया में भी यह अध्याय हमें आत्मिक संतुलन और शांति प्रदान करने का मार्ग दिखाता है।
Next –
