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भारत के उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 C.P. राधाकृष्णन की विजय यात्रा

laxmi patel September 10, 2025 1 min read
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2025 भारत उपराष्ट्रपति चुनाव राधाकृष्णन की विजय

प्रस्तावना

9 सितंबर 2025 को भारतीय संसद में हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में महाराष्ट्र के राज्यपाल और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता C.P. राधाकृष्णन ने विपक्षी गठबंधन INDIA के उम्मीदवार, पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज B. सुदर्शन रेड्डी को हराकर भारत के 15वें उपराष्ट्रपति के रूप में विजय प्राप्त की। यह चुनाव उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के जुलाई में स्वास्थ्य कारणों से अचानक इस्तीफा देने के बाद हुआ था।


C.P. राधाकृष्णन एक परिचय

1. शिक्षा और प्रारंभिक जीवन

राधाकृष्णन ने तिरुप्पुर के V.O. चिदंबरम कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने व्यवसाय प्रबंधन (BBA) में डिग्री प्राप्त की और उसी समय सामाजिक और छात्र संगठन गतिविधियों में सक्रिय हो गए। युवा अवस्था में ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़कर समाज सेवा और राष्ट्रभक्ति के मूल्य अपनाए।

2. राजनीतिक करियर की शुरुआत

राधाकृष्णन ने 1980 के दशक में राजनीति में कदम रखा। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तमिलनाडु इकाई में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी स्पष्ट और निष्पक्ष नेतृत्व शैली के कारण वे जल्दी ही पार्टी में प्रतिष्ठित बने।

  • लोकसभा सांसद राधाकृष्णन ने 1998 और 1999 में कोयंबटूर से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। सांसद के रूप में उन्होंने शिक्षा, कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल की।

  • राज्य नेतृत्व वे तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष भी बने और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  • राष्ट्रीय पद वे भारतीय कोयला बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ऊर्जा और खनन क्षेत्रों में नीतिगत सुधार किए।

3. राज्यपाल पद और संवैधानिक अनुभव

राधाकृष्णन ने 2023 में झारखंड का राज्यपाल बनने के बाद संवैधानिक पदों पर कार्य करने का अनुभव प्राप्त किया। जुलाई 2024 में उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया। राज्यपाल के रूप में उन्होंने संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए, जो उनकी निष्पक्षता और न्यायप्रियता को दर्शाते हैं।

4. सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान

राधाकृष्णन केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि समाजसेवी भी हैं। वे शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं। उनके नेतृत्व में कई सामाजिक कार्यक्रमों ने युवाओं और ग्रामीण समुदायों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए हैं।

5. व्यक्तिगत जीवन और मूल्यों की झलक

राधाकृष्णन की छवि एक संयमी, अनुशासित और दूरदर्शी नेता की रही है। वे हमेशा अपने मूल्यों के प्रति ईमानदार रहे हैं और विवादों से दूर रहकर संतुलित और समावेशी राजनीति करने में विश्वास रखते हैं। उनका व्यक्तित्व विभिन्न समुदायों और राजनीतिक दलों के बीच संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करता है।

C.P. राधाकृष्णन का जन्म 20 अक्टूबर 1957 को तमिलनाडु के तिरुप्पुर जिले में हुआ था। उन्होंने V.O. चिदंबरम कॉलेज से BBA की डिग्री प्राप्त की और व्यवसायी, कृषक और समाजसेवी के रूप में कार्य किया। राजनीतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से की, जो उनकी विचारधारा और कार्यशैली को प्रभावित करने वाला कारक रहा। राधाकृष्णन ने 1998 और 1999 में कोयंबटूर से लोकसभा चुनाव लड़ा और सांसद के रूप में कार्य किया। इसके बाद वे तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष बने और भारतीय कोयला बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। 2023 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया, और जुलाई 2024 में वे महाराष्ट्र के राज्यपाल बने।


उपराष्ट्रपति चुनाव परिणाम और विश्लेषण

9 सितंबर 2025 को आयोजित भारत के उपराष्ट्रपति चुनाव में C.P. राधाकृष्णन ने 452 मत प्राप्त कर विजय हासिल की, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी, पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज B. सुदर्शन रेड्डी को 300 मत मिले। कुल 781 निर्वाचक मंडल सदस्यों में से 767 ने मतदान किया, जिसमें 752 मत वैध और 15 अवैध पाए गए।

1. विजय का मार्जिन और राजनीतिक महत्व

राधाकृष्णन की जीत 152 वोट के अंतर से हुई, जो न केवल स्पष्ट रूप से बड़ी जीत है बल्कि इसे राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है। यह अंतर विपक्ष की असंगति और गठबंधन में मौजूद संभावित मतभेदों को उजागर करता है। राजनीतिक विश्लेषक इसे यह संकेत मानते हैं कि विपक्षी दलों के बीच रणनीतिक एकता कमजोर है, और भाजपा ने इस स्थिति का पूरी तरह लाभ उठाया।

2. क्रॉस वोटिंग की भूमिका

चुनाव के दौरान कुछ विपक्षी सांसदों द्वारा क्रॉस वोटिंग की खबरें आईं। क्रॉस वोटिंग से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत विचार और क्षेत्रीय राजनीतिक दबाव अक्सर दल के निर्देश से अलग फैसले लेने पर मजबूर करते हैं। इससे यह भी संकेत मिलता है कि संसद में पार्टियों के बीच गठबंधन की मजबूती हमेशा स्थिर नहीं रहती और कभी-कभी व्यक्तिगत निर्णय निर्णायक साबित होते हैं।

3. NDA और सहयोगी दलों का समर्थन

राधाकृष्णन को NDA और उसके सहयोगी दलों का पूर्ण समर्थन मिला। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों के गठबंधन सहयोगियों ने खुलकर उन्हें समर्थन दिया। यह एक रणनीतिक सफलता मानी जा रही है, क्योंकि इससे भाजपा और उसके सहयोगी दलों का प्रभाव राज्यसभा में और मजबूत हुआ।

4. सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन

राधाकृष्णन का दक्षिण भारत से आना, विशेष रूप से तमिलनाडु से, एक सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन प्रदान करता है। इससे यह संदेश गया कि भारतीय राजनीति में केवल उत्तर और पश्चिम का ही नहीं, बल्कि दक्षिण के नेताओं को भी संवैधानिक और राष्ट्रीय नेतृत्व में स्थान दिया जा रहा है। इस कदम से दक्षिण भारत में भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ने की संभावना भी है।

5. चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता

इस चुनाव में ईवीएम का प्रयोग किया गया और मतदान पूरी तरह पारदर्शी तरीके से संपन्न हुआ। निर्वाचन आयोग ने प्रत्येक चरण की निगरानी सुनिश्चित की और मतदान के बाद मतगणना में कोई विवाद नहीं हुआ। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संसद की विश्वसनीयता को मजबूत करने में मदद मिली।

6. विश्लेषकों का निष्कर्ष

विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव का परिणाम केवल उपराष्ट्रपति पद तक सीमित नहीं है। यह भारतीय राजनीति में गठबंधन की स्थिरता, क्षेत्रीय संतुलन और व्यक्तिगत नेतृत्व क्षमता की अहमियत को दर्शाता है। राधाकृष्णन की स्पष्ट जीत भाजपा के रणनीतिक कौशल, दक्षिण भारत में उसकी बढ़ती स्वीकार्यता और विपक्ष के भीतर संभावित मतभेदों को उजागर करती है

चुनाव में कुल 781 निर्वाचक मंडल सदस्य थे, जिनमें से 767 ने मतदान किया। इसमें से 752 मत वैध थे, जबकि 15 मत अवैध पाए गए। राधाकृष्णन को 452 पहले पसंद के वोट मिले, जबकि सुदर्शन रेड्डी को 300 वोट मिले। इस प्रकार, राधाकृष्णन ने 152 वोटों के अंतर से विजय प्राप्त की।

राधाकृष्णन की जीत में NDA के सहयोगी दलों के समर्थन के साथ-साथ कुछ विपक्षी दलों के सांसदों द्वारा क्रॉस वोटिंग की संभावना भी चर्चा का विषय रही। विशेष रूप से, महाराष्ट्र के महायुति नेताओं ने राधाकृष्णन को बधाई दी, जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और अजित पवार शामिल थे


राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

1. दक्षिण भारत में भाजपा की बढ़ती भूमिका

राधाकृष्णन तमिलनाडु से आते हैं, जो पारंपरिक रूप से भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण क्षेत्र रहा है। उनकी जीत दक्षिण भारत में भाजपा की स्थिति मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखी जा रही है। यह संकेत देता है कि भाजपा केवल उत्तर और मध्य भारत में ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में भी अपनी राजनीतिक पहुंच और प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रही है।

2. विपक्षी गठबंधन और क्रॉस वोटिंग का प्रभाव

राधाकृष्णन की जीत में विपक्षी दलों के भीतर कुछ मतदाता रुख बदलने की खबरें भी सामने आईं। यह राजनीतिक गठबंधन की अस्थिरता और कुछ सांसदों की व्यक्तिगत रणनीतियों को उजागर करता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीति में केवल संख्या बल ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत नेतृत्व क्षमता और राजनैतिक समझदारी भी निर्णायक भूमिका निभाती है।

3. सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण

राधाकृष्णन की पृष्ठभूमि RSS और भाजपा से जुड़ी हुई है, लेकिन उनकी छवि सर्वसमावेशी और सहिष्णु नेता की है। दक्षिण भारतीय समाज में उनकी स्वीकार्यता और सामाजिक कार्यों में सक्रियता उन्हें एक संतुलित और भरोसेमंद नेता बनाती है। उनके नेतृत्व में उपराष्ट्रपति का पद न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी एक पुल का काम कर सकता है, जो विभिन्न समुदायों और राज्यों के बीच संवाद को मजबूत करेगा।

4. भाजपा के लिए रणनीतिक लाभ

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राधाकृष्णन की उपराष्ट्रपति के रूप में नियुक्ति भाजपा के लिए लंबी अवधि में कई लाभ लेकर आएगी। यह दक्षिण भारत में पार्टी की ब्रांड वैल्यू बढ़ाएगी, राज्यसभा में पार्टी के प्रभाव को मजबूत करेगी, और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की छवि को संतुलित और समावेशी नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत करेगी।

5. राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव

राधाकृष्णन की जीत का प्रभाव केवल उपराष्ट्रपति पद तक सीमित नहीं है। यह राजनीतिक संकेत देता है कि भारतीय संसद में मजबूत नेतृत्व और पारदर्शिता को महत्व दिया जा रहा है। साथ ही, यह विपक्षी दलों के लिए यह चुनौती भी प्रस्तुत करता है कि उन्हें अपने रणनीतिक दृष्टिकोण और एकता पर पुनर्विचार करना होगा।

राधाकृष्णन की विजय भाजपा के लिए दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। तमिलनाडु से होने के कारण, राधाकृष्णन का चयन भाजपा के दक्षिण भारत में विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनकी छवि एक सुलझे हुए और सर्वसमावेशी नेता की रही है, जो विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखते हैं। कांग्रेस ने भी उन्हें बधाई देते हुए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के उद्धरण का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था, “मैं किसी एक पार्टी का नहीं, सभी पार्टियों का हूं।” Business 


उपराष्ट्रपति की भूमिका और महत्व

भारत का उपराष्ट्रपति संविधान के तहत दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर होता है। वह राज्यसभा का सभापति होता है और राष्ट्रपति के असमर्थ होने पर उनके कर्तव्यों का निर्वहन करता है। हालांकि यह पद मुख्यतः सांविधानिक और प्रतिनिधिक होता है, फिर भी यह भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

C.P. राधाकृष्णन की उपराष्ट्रपति के रूप में विजय भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। उनकी पृष्ठभूमि, अनुभव और सर्वसमावेशी नेतृत्व की शैली उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त बनाती है। उनकी नियुक्ति से यह संकेत मिलता है कि भाजपा दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए गंभीर है। अब यह देखना होगा कि वे राज्यसभा के सभापति के रूप में अपनी भूमिका को किस प्रकार निभाते हैं और भारतीय राजनीति में क्या नई दिशा प्रदान करते हैं।

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